Tag - वासुपूज्य जिनालय

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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : अहंकार और आलस्य पतन का भाव उत्पन्न करते है – आर्यिका विभाश्री

वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आत्मा के शांत समुंद्र में जो राग-द्वेष रूपी लहरें उठती हैं, यही हमारे...

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श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान : अर्घ्य मंत्रोच्चार के साथ चढ़ाए गए

श्री दिगंबर जैन मंदिर, भागलपुर में जैन संत परम पूज्य मुनि श्री 108 विशल्य सागर मुनिराज ससंघ में सानिध्य में श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के दूसरे वलय के...

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आर्यिका विभाश्री माताजी के चातुर्मासिक प्रवचन : प्रत्येक जीव के अपनी-अपनी कषायों के कारण अनन्त प्रकार के परिणाम

वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि प्रत्येक जीव के अपनी-अपनी कषायों के कारण अनन्त प्रकार के परिणाम हो सकते...

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कर्म का प्रतिफल हमें ही भोगना पड़ता है: आर्यिका विभाश्री ने प्रवचन में कर्म के बारे में बताया 

यदि हम किसी से ईर्ष्या करते हैं, किसी का बुरा सोचते हैं तो हमें पाप का बंध अवश्य होगा। धर्म वर्जिता स्वयं धर्म नहीं करता, जो अपने अधीन है उसको भी धर्म नहीं...

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आर्यिका विभा श्री की धर्मसभा : देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईर्ष्या भाव धरूं रहें भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूं

वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा मन जाये तो जान दे, तू मत जाए शरीर। रसरी डरी कमान में, काह करेगा तीर। ज्ञान...

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आर्यिका विभा श्री की धर्मसभा : इहलोक में एवं परलोक में ‘धर्म’ ही हमारा सच्चा मित्र है 

आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रवचन देते हुए कहा कि हमें यह ध्यान देना है कि हमें किन भावों से बचना है, जिससे क्रूरता हमारे अंदर...

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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : अपराध बोध हुए बिना अपराध से मुक्ति पाना असम्भव- आर्यिका विभा श्री 

गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रातःकालीन प्रवचन के दौरान कहा कि अपराध बोध हुए बिना अपराध से मुक्ति पाना असम्भव है। उन्होंने...

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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : आत्मा में राग-द्वेष युक्त भावों का उत्पन्न होना हिंसा है- आर्यिका विभा श्री 

गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रातःकालीन प्रवचन के दौरान कहा कि समुद्र का जल तो शांत होता है, उसमें हवा के द्वारा लहरें...

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इंद्रिय जनित विषय भोगों की आकांक्षा दुःख का कारण है और परिणामों की अत्यंत निर्मलता ही धर्म है : आर्यिका विभा श्री ने प्रवचन में कहा 

गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रवचन के दौरान कहा कि इंद्रिय जनित विषय भोगों की आकांक्षा दुःख का कारण है और परिणामों की...

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तत्वार्थ सूत्र शिविर : जीव के शुभाशुभ परिणाम को लेश्या कहा गया है – आर्यिका विभाश्री माताजी

गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में सुबह प्रवचन के दौरान सर्वप्रथम तत्वार्थ सुत्र शिविर में लेश्याओ के बारे में विस्तार बताया।...

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