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स्वभाव मेरी संपत्ति है, कर्मों ने उस पर कब्जा कर रखा है

न्यूज सौजन्य- राजेश जैन दद्दू 

इंदौर। ‘आपका जीवन इसलिए अस्त-व्यस्त है क्योंकि आपका अपने जीवन के प्रति शुभ भाव नहीं हैं। जिन्होंने स्वभाव की प्राप्ति कर ली, वह वंदनीय हैं। जिन शासन में नाम की वंदना नहीं होती, गुणों की वंदना होती है। चाहे श्रावक हों या श्रमण जिसमें जितने अंश में गुण हैं, वह उतने अंश में वंदनीय है। जैसे- जैसे गुणों का वर्धन होता है तो पूज्यता बढ़ती है और गुणवान के प्रति श्रद्धा भी बढ़ती है।’

यह उद्गार गुरुवार को मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने समोसरण मंदिर कंचन बाग में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमारे यहां परमात्मा, परमात्मा नहीं बनते, भक्त ही परमात्मा बनते हैं। इस दृष्टि से प्रत्येक जीवात्मा परमात्मा है। सभी का कर्तव्य है कि परिस्थिति अनुकूल ना होने पर भी धैर्य और सभी जीवों के प्रति समता भाव रखें, राग द्वेष की परिणति घटाएं। हमारा प्रयास कर्मों की स्थिति को भी घटाने का होना चाहिए ‌और यह चिंतन करना चाहिए कि स्वभाव मेरी संपत्ति है और कर्मों ने उस पर कब्जा कर रखा है। हमें कर्मों से अपनी संपत्ति छुड़ाना है। धर्मसभा को मुनिश्री अप्रमित सागर जी महाराज ने भी संबोधित किया। सभा का संचालन हंसमुख गांधी ने किया।

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