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आत्महत्या कायरता, जीवन नष्ट होता है, कर्म नहीं- आचार्य अनुभवसागर महाराज

लोहारिया,20 जुलाई 2020। जीवन सतत उत्थान, पतन और उतार-चढ़ाव से भरा हुआ है। प्रतिपल एक निश्चितता सदैव ही रहती है क्योंकि जीवन अनुमान का विषय नहीं है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली तकनीकी स्तर पर तो बहुत उन्नत हो चुकी है लेकिन संसार धैर्य के मामले में पिछड़ता जा रहा है। इसका कारण अब लगातार बढ़ती आत्महत्या की संख्या के रूप में सामने आ रहा है। यह कहना है आचार्य अनुभवसागर महाराज का। लोहारिया में अपने प्रवचन के दौरान सोमवार को उन्होंने कहा कि प्रतिष्ठा,प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन ने छात्रों की मानसिकता पर अनावश्यक दबाव बढ़ा दिया है। माता- पिता के अपेक्षा भाव बच्चों को नियमित रूप से मानसिक स्तर पर कमजोर बना रहे हैं। जिस उम्र में उत्साह और कुछ कर गुजरने की तमन्ना होनी चाहिए, उस दौरान वे माता-पिता और परिवार की अपेक्षाओं के बोझ से जूझ रहे हैं। इसे आश्चर्य ही कहेंगे कि आत्महत्या करने वालों मे असफल लोगों का प्रतिशत बहुत कम है और उच्च परिणामों वाले छात्रों का प्रतिशत अधिक। यही चिंतन का विषय है। पलायन की यह मानसिकता आने वाली और वर्तमान पीढ़ी के लिए अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि आत्महत्या वर्तमान से तो निकाल देती है परंतु कर्म तो नहीं छोड़ सकता। प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन के गति के नियमों का तीसरा नियम भी यही कहता है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया बराबर विपरीत होती है। अत: हमें अपनी पीढ़ी को शैक्षणिक स्तर के साथ संस्कार और मानसिक स्तर पर मजबूत बनाना होगा। उन्हें आगे बढ़ाने का लक्ष्य तो देना होगा परंतु दबाव आग्रह के साथ नहीं बल्कि उनकी योग्यता मानसिकताओं का अध्ययन करते हुए देना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते कहा कि चींटी कई बार गिरती है परंतु अपना प्रयास नहीं छोड़ती जब वह मामूली सी हो कर भी हार नहीं मानती तो इतना योग्य कुशल बुद्धिसंपन्न मनुष्य इतनी सी असफलताओं को सहन क्यों नहीं कर पा रहा। परिवार, मित्र और शिक्षकों की भूमिका छात्रों के मानसिक दृढ़ता का एक महत्वपूर्ण घटक है।

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