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परिवर्तनशील संसार में अडिग: दिगंबर साधु-साध्वियों का अनुशासन


धरती पर शायद ही कोई जीवन दिगंबर जैन साधु-साध्वियों के विहार जितना कठोर, अनुशासित और आध्यात्मिक हो। जहाँ साधारण मनुष्य घर, संपत्ति और भौतिक सुखों के पीछे भागता है, वहीं दिगंबर साधु इनका पूर्ण त्याग कर निरंतर विहार में रहते हैं। साधु चर्या पर आज पढ़िए, प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी का यह विशेष आलेख।


धरती पर शायद ही कोई जीवन दिगंबर जैन साधु-साध्वियों के विहार जितना कठोर, अनुशासित और आध्यात्मिक हो। जहाँ साधारण मनुष्य घर, संपत्ति और भौतिक सुखों के पीछे भागता है, वहीं दिगंबर साधु इनका पूर्ण त्याग कर निरंतर विहार में रहते हैं। नग्न, बिना किसी संग्रह के, प्रकृति के कठोर ताप सहते हुए वे आंतरिक शांति और स्थिरता के प्रतीक बनते हैं। यह जीवन अहिंसा और अपरिग्रह का जीवंत उदाहरण है, जो सिद्ध करता है कि सच्ची स्थिरता बाहरी सुखों में नहीं, बल्कि आत्मिक संयम और अनासक्ति में है। दिगंबर परंपरा में वस्त्रों का त्याग मोक्ष का प्रथम द्वार माना जाता है, जो साधु को संसार की माया से मुक्त करता है।

दिगंबर जैन विहार का सार है

निरंतर यात्रा, सजगता और जीव-करुणा। साधु-साध्वियाँ नंगे पाँव पैदल चलते हैं, चाहे धरती सूरज की तपिश से जल रही हो या बारिश की बूंदें चुभती हों। जैन आगमों के अनुसार, उनकी नग्नता—जिसमें दिशाएँ ही वस्त्र हैं—अपरिग्रह का प्रतीक है। वे लंबे समय तक कहीं नहीं रुकते, सिवाय चातुर्मास के, जब चार माह साधना और प्रवचन में बिताते हैं। यह विहार उन्हें संसार की नश्वरता की याद दिलाता है, क्योंकि दिगंबर दर्शन में आत्मा ही शाश्वत है, शरीर और बाह्य वस्तुएँ क्षणिक। परिषह (कष्ट सहन) उनके जीवन का हिस्सा है—भूख, प्यास, ठंड, गर्मी को सहते हुए वे परिषह जय प्राप्त करते हैं। ‘सर्वार्थसिद्धि’ ग्रंथ कहता है कि परिषह स्वाभाविक हैं, जबकि बाह्य तप इच्छा से किए जाते हैं, और दिगंबर साधु इन्हें सहजता से अपनाते हैं।

इस विहार की स्थिरता का रहस्य आत्मबल और संयम है। बिना घर-द्वार के भी वे अडिग रहते हैं, क्योंकि उनकी स्थिरता आंतरिक है। आचार्य विद्यासागर जी महाराज, जिन्होंने 22 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन त्यागा और कठोर नियमों का पालन किया, ने कहा था: “सच्ची स्थिरता संग्रह में नहीं, त्याग में है। अपरिग्रह अपनाने पर संसार की हलचल मन को छू नहीं पाती।” उनका जीवन इसका प्रमाण है—नमक, चीनी, हरी सब्जियाँ, दूध-दही का त्याग; दिन में एक बार जल ग्रहण; अनियत विहार। वे न एयर कंडीशंड कमरों में रुके, न मौसमी वस्त्र अपनाए। ठंड में बिना कंबल, गर्मी में बिना छत्र, वे विहार करते रहे। मुनि प्रणम्यसागर जी ने ‘अनासक्त महायोगी’ में लिखा कि आचार्य विद्यासागर जी का प्रत्येक कदम आत्म-जागृति का संदेश था: “मनुष्य स्थायित्व की खोज में भटकता है, पर स्थिरता अनासक्ति से जन्म लेती है।” 2024 में चंद्रगिरि तीर्थ पर सल्लेखना द्वारा समाधि तक, उनका जीवन दिगंबर विहार का आदर्श रहा।

दिगंबर जैन विहार अनुशासन और संयम की जीवंत मिसाल है। साधु का संग्रह केवल पिच्छी (सूक्ष्म जीवों की रक्षा हेतु), कमंडल और शास्त्र तक सीमित है। नींद बिना बिस्तर के, जमीन पर। 18 परिषह—भय, रोग, शीत—सहते हुए वे चारित्र की रक्षा करते हैं। तत्त्वार्थ सूत्र में वर्णित छह बाह्य तप—अनशन, रसायन, प्रभुधे—उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। यह कठोरता उन्हें असाधारण बनाती है। दिगंबर दर्शन में साध्वियाँ भी समान नियमों का पालन करती हैं, हालाँकि कुछ परंपराएँ उन्हें नग्नता से अलग रखती हैं, फिर भी वे पूर्ण मोक्ष की पात्र हैं।

यह विहार केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, समाज के लिए प्रेरणा है। जब दिगंबर साधु बिना संपत्ति के संतुष्ट रह सकता है, तो गृहस्थ अपनी आवश्यकताओं को क्यों नहीं सीमित कर सकता? आचार्य विद्यासागर जी ने कहा: “अहिंसा केवल भोजन का त्याग नहीं, हर कदम पर जीव-रक्षा है। विहार सिखाता है कि करुणा से स्थिरता मिलती है।” मुनि प्रमाणसागर जी ने बल दिया: “परिवर्तनशील संसार में स्थिरता का रहस्य अनासक्ति है।” उनका जीवन बताता है कि बाहरी स्थायित्व क्षणिक है, पर आंतरिक स्थिरता शाश्वत। आज के उपभोक्तावादी युग में, जहाँ भौतिकता हावी है, दिगंबर विहार का संदेश प्रासंगिक है: सुख त्याग में है, संग्रह में नहीं।

दिगंबर साधु-साध्वियों का विहार जीवन की नश्वरता का बोध कराता है। आज का स्थान कल बदल जाएगा, आज का संबंध कल टूट सकता है। फिर मोह के बंधन क्यों? यह साधना मोह-माया से मुक्ति दिलाकर परम शांति की ओर ले जाती है। नग्न वेष में, पिच्छी हाथ में, नंगे पाँव धूल भरे रास्तों पर चलते साधु चलते-फिरते तीर्थ हैं। उनका मौन, संयम और सजगता मानवता को पुकारती है: स्थिरता के लिए स्थायित्व जरूरी नहीं। आचार्य विद्यासागर जी के शब्द हैं: “आत्मा का बोध ही सच्चा आश्रय है।” प्रमाणसागर जी ने स्पष्ट किया: “विहार में स्थिरता का रहस्य है—सब त्यागकर स्वयं को पाना।”

दिगंबर विहार का संदेश है कि शांति बाहरी खोज में नहीं, आंतरिक यात्रा में है। बाहरी स्थायित्व क्षणभंगुर, पर आंतरिक स्थिरता अनंत। साधु-साध्वियों का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सुख धन में नहीं, संयम और त्याग में है। उनका हर कदम चीखता है—बिना स्थायित्व के भी स्थिरता संभव है। यह परंपरा हमें आत्म-निरीक्षण का अवसर देती है: क्या हम इच्छाओं को सीमित कर सकते हैं? क्या अहिंसा को जीवन का आधार बना सकते हैं? क्या मोह त्यागकर स्थिरता पा सकते हैं? यह विहार केवल साधना नहीं, एक दर्शन और क्रांति है, जो मानवता को मुक्ति का मार्ग दिखाती है। इस संदेश को अपनाकर हम संसार की अस्थिरता से अडिग रह सकते हैं।

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