बदनावर (वर्द्धमानपुर) नगर के भू-गर्भ से सैकड़ो जिन प्रतिमाएं पिछले 75 वर्षों में समय-समय पर प्राप्त हुई है। जिसमें भगवान आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी तक के लगभग सभी तीर्थंकरों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी का विशेष आलेख…
इंदौर। मध्यकाल में भारतीय संस्कृति विरासत एवं मंदिरों का जो विध्वंसकारी मंज़र हमें इतिहास में पढ़ने को मिलता है, जिसमें भारत के कई विशिष्ट ऐतिहासिक नगर जमींदोज हो गए और उनका नाम स्मरण तक नहीं रहा। उन्हीं नगरों में एक मालवा का एक प्राचीन धर्म क्षेत्र वर्द्धमानपुर है, जिसका वर्तमान नाम बदनावर है। यह स्थान गुप्त काल से लेकर मध्य काल तक धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप में अत्यंत समृद्ध रहा। जिसका उल्लेख आठवीं शताब्दी में महाकवि प्रबुद्धाचार्य श्री जिनसेण स्वामी ने अपने हरिवंश पुराण की प्रशस्ति में इस नगर के नाम के उल्लेख करते हुए किया, जो महत्वपूर्ण है। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि बदनावर (वर्द्धमानपुर) नगर के भू-गर्भ से सैकड़ो जिन प्रतिमाएं पिछले 75 वर्षों में समय-समय पर प्राप्त हुई है। जिसमें भगवान आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी तक के लगभग सभी तीर्थंकरों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। उसमें प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ स्वामी की प्रतिमाएं बहुलता से प्राप्त हुई है। यहां का भोयरावाला मंदिर अति प्राचीन होकर भगवान आदिनाथ स्वामी को ही समर्पित है। जवाहर मार्ग स्थित श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में भी अन्य तीर्थंकर प्रतिमाओं के साथ भगवान श्री आदिनाथ स्वामी की यही भू-गर्भ से प्राप्त प्रतिमा विराजमान हैं। इसी प्रकार धार के जैन मंदिर में भी बदनावर (वर्द्धमानपुर) भू-गर्भ से प्राप्त प्रतिमा विराजमान हैं। उज्जैन संग्रहालय में आदिनाथ स्वामी की लगभग 5-6 प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। बदनावर वर्द्धमानपुर से प्राप्त प्रतिमाएं अपने आप में कई विशेषताएं लिए हुए है।
प्राचीन नाम का भी स्पष्ट उल्लेख
यहां भगवान के यक्ष यक्षिकाएं (रक्षक देवी देवता) की प्रतिमा भी प्रचूर मात्रा में प्राप्त हुई हैं। जिसमें भगवान आदिनाथ स्वामी की यक्षिका चक्रेश्वरी देवी की सुंदर लेख युक्त प्रतिमा भी प्राप्त हुई है, जो वर्तमान में निकट ही आमला ग्राम के श्वेतांबर जैन मंदिर में विराजमान है। यह प्रतिमा की नक्काशी की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही इसके पादपीठ पर जो लेख अंकित है। उसमें बदनावर के प्राचीन नाम का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
अभिषेक पूजन आदि विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे
यह इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण प्रतिमा है क्योंकि, इसमें प्रतिमा के प्रतिष्ठा का संवत् 1224 के साथ ही जैन संत पंडिताचार्य श्री धर्म कीर्ति और उनके शिष्य ललित कीर्ति के नाम के साथ श्रावक-श्राविकाओं के नाम का महत्वपूर्ण उल्लेख है। ये सभी प्रतिमाएं लगभग 8वीं और 9वीं शताब्दी से लेकर 13वीं और्व14वीं शताब्दी की है। चैत्र कृष्ण नवमी 12 मार्च गुरूवार को भगवान श्री आदिनाथ जन्म कल्याणक दिवस पर सभी मंदिरों में इन भू-गर्भ से प्राप्त तीर्थंकर प्रतिमाओं के अभिषेक पूजन आदि विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे।













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