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आर्यिका विजयामती माताजी चलती-फिरती पाठशाला थीं : गुणानुवाद सभा में वक्ताओं ने दिया उद्बोधन


कामां के शान्तिनाथ दिगम्बर जैन दीवान मंदिर में आर्यिका विजयामति माताजी की 95 वीं जन्मजयंती के अवसर पर गुणानुवाद सभा आयोजित की गई। इस अवसर पर अभिषेक-शांतिधारा के कार्यक्रम हुए। उपस्थित लोगों ने माताजी को विनयाजंलि अर्पित की। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट…


कामां। यथा नाम तथा गुण वाली कहावत कामां में जन्मीं आर्यिका विजया मति माताजी पर चरितार्थ होती है। उनका ग्रहस्थ अवस्था का नाम सरस्वतीदेवी था। उनकी वाणी में साक्षात सरस्वती का वास रहता था। आर्यिका दीक्षा उपरांत आचार्य विमल सागर ने विजयामति नाम रखा तो उन्होंने नाम के अनुरूप सम्पूर्ण भारतवर्ष में जैन धर्म की विजयी पताका फहराई। संघ में उन्हें विदुषी होने के कारण चलती-फिरती पाठशाला की संज्ञा दी जाती थी। उक्त कथन कामां के शान्तिनाथ दिगम्बर जैन दीवान मंदिर में आर्यिका विजयामति माताजी की 95 वीं जन्मजयंती के अवसर पर आयोजित गुणानुवाद सभा में वक्ताओं ने व्यक्त किये।

अर्पित की विनयांजलि

श्री शांतिनाथ मन्दिर समिति कामां के उत्तम जैन व प्रदीप जैन के अनुसार मूलनायक शान्तिनाथ भगवान स्थापना तिथि एवं गणिनी आर्यिका विजयामति माताजी की 95वीं जन्मजयंती पर वैशाख सुदी द्वादशी को प्रातः अभिषेक, शान्तिधारा की गई। अवसर पर राजकुमार, विवेक जैन बड़जात्या को सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य मिला। शाम को 48 दीपकों से भक्तामर पाठ की महाअर्चना कर विश्व शांति की भावना भाई गयी। गुणानुवाद सभा का प्रारम्भ सुनील जैन पथवारी के मंगलाचरण व माताजी के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। सभा में मन्दिर समिति के महामंत्री संजय जैन बड़जात्या ने कहा कि यह हमारा गौरव है कि आर्यिका विजया मति माताजी का जन्म कामां की धरा पर सेठ सन्तोषीलाल व माता चिरोंजी देवी के आंगन में हुआ। माताजी का ससंघ वर्षायोग वर्ष 1995 में कामां नगरी में हुआ था, तब अनेकों बड़े धार्मिक आयोजनों से समाज में धर्म के संस्कार रोपित हुए। कार्यक्रम में जैन समाज के पूर्व संरक्षक सत्येन्द्र जैन, धर्म जागृति संस्थान के अध्यक्ष संजय सर्राफ, रिंकू बड़जात्या ने भी माताजी के अनेकों संस्मरण सुनाकर अपनी विनयांजलि अर्पित की।

धर्म शास्त्रों का लेखन

ज्ञातव्य हो कि पूज्य गणिनी आर्यिका विजयामती माताजी ने अपने साधनाकाल में 300 से अधिक धर्म शास्त्रों का लेखन किया। उन्हें आचार्य महावीर कीर्ति महाराज द्वारा गणिनी पद प्रदान किया, तब वे प्रथम गणिनी के रूप में विख्यात हुईं। कामां में वर्षायोग के दौरान समाज द्वारा उन्हें समाधि कल्पद्रुम की उपाधि भी प्रदान की गई। इस अवसर पर युवा परिषद, मित्र मंडल, धर्म जागृति संस्थान, ज्ञान विजया महिला मंडल, महिला परिषद, चन्द्रप्रभु महिला मंडल के सदस्यों के साथ साथ सैकड़ों की संख्या में सधर्मी महिला, पुरुष व बच्चे उपस्थित थे।

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