श्रुत पंचमी प्राकृत भाषा दिवस के पावन अवसर पर जैन अध्ययन केंद्र, क.जे. धर्मा स्टडीस, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई द्वारा ‘प्राकृत अध्ययन की महत्ता एवं आवश्यकता’ विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन श्रुत पंचमी की पूर्व संध्या को किया गया। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
मुंबई। श्रुत पंचमी प्राकृत भाषा दिवस के पावन अवसर पर जैन अध्ययन केंद्र, क.जे. धर्मा स्टडीस, सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई द्वारा ‘प्राकृत अध्ययन की महत्ता एवं आवश्यकता’ विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन श्रुत पंचमी की पूर्व संध्या को किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ जैन अध्ययन केंद्र के एम.ए. जैनोलॉजी एंड प्राकृत की छात्रा अल्पा वासा के प्राकृत मंगलाचरण से हुआ। कार्यक्रम के संयोजक एवं जैन सेंटर में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अरिहन्त ने प्राकृत भाषा में ही श्रुत पंचमी की महत्ता को प्रस्तुत करने के साथ ही विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि आचार्य पुष्पदन्त और आचार्य भूतबलि ने, आचार्य धरसेन की सैद्धान्तिक देशना को श्रुतज्ञान द्वारा स्मरण कर, उसे ‘षट्खण्डागम’ नामक महान् परमागम के रूप में प्राकृत भाषा में लिपिबद्ध कर, ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन पूर्ण किया। अत: यह दिवस शास्त्र उन्नयन एवं श्रुत संरक्षण के महापर्व श्रुतपंचमी के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
प्राच्य परंपराओं की हर भाषा को सीखें
संस्था की निदेशिका डॉ. सुप्रिया राय ने सभी का स्वागत करते हुए कहा कि धर्म अध्ययन केंद्र का मुख्य उद्देश्य प्राकृत, पाली, संस्कृत जैसी प्राच्य भाषाओं के अध्ययन के प्रति लोगों का जागरूक करना एवं इनका शोधपरक कार्यों के माध्यम से संवर्धन करना है। हमें प्राच्य परंपराओं की हर भाषा को सीखना चाहिए क्योंकि मूल भारतीय ज्ञान परंपरा इन भाषाओं में ही संरक्षित है। अतः अकादमिक स्तर पर हमारी, इन भाषाओं के संरक्षण की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, जिसका एक मात्र समाधान इसका पठन-पाठन ही है।
प्राकृत साहित्य धर्म, दर्शन, ज्ञान, विज्ञान से परिपूर्ण
जैन अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. शुद्धात्म प्रकाश जैन ने कवि वाक्पतिराज कृत गौडवहो ग्रंथ की प्राकृत गाथा को उद्धृत करते हुए कहा कि जिस प्रकार सभी नदियां समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार सभी भाषाएँ प्राकृत भाषा से उत्पन्न होती हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृत साहित्य धर्म, दर्शन, ज्ञान, विज्ञान से परिपूर्ण है । उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि श्रुत पंचमी को प्राकृत भाषा दिवस के रूप में मनाने का संकल्प, कुंदकुंड भारती परिसर, नई दिल्ली में 28-30 अक्टूबर 1994 को, पूज्य राष्ट्रसंत श्री 108 विद्यानंद जी महाराज के सानिध्य में आयोजित राष्ट्रीय शौरसेनी प्राकृत संगोष्ठी में प्रो. फूलचंद जैन प्रेमी (वाराणसी) द्वारा प्रस्तावित किया गया था, जिसका समर्थन प्रो. रमेशचंद जैन (बिजनौर) ने किया और जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था। पूज्य आचार्यश्री ने आशीर्वाद देकर इस प्रस्ताव पर मुहर लगाते हुए, ‘प्राकृत भाषा दिवस’ घोषित किया और ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी यानि श्रुतपंचमी महापर्व को, 1995 से ‘प्राकृत भाषा दिवस’ के रूप में भी मनाया जाने लगा । साथ ही उन्होंने सोमैया जैन सेंटर में चल रहे जैनदर्शन एवं प्राकृत अध्ययन के विभिन्न पाठ्यक्रमों की जानकारी दी। विभाग में रिसर्च असिस्टेंट रेशमा ने विशेष वक्ता विद्वान् का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया।
उपदेश जीव मात्र का कल्याण करने वाले
आमंत्रित विशेष वक्ता डॉ. सुमत कुमार जैन जो कि जैनदर्शन एवं प्राकृत विभाग, मोहनलाल सुखड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, उन्होंने अकादमिक रूप से प्राकृत के पठन-पाठन पर प्रकाश डालते हुए प्राकृत भाषा एवं साहित्य के विविध आयामों को प्रस्तुत किया और इसकी महत्ता एवं आवश्यकता से लोगों को परिचित कराया। उन्होंने बताया कि भगवान महावीर और गौतम बुद्ध ने अपने उपदेशों का माध्यम इसलिए जनभाषा प्राकृत भाषा को बनाया क्योंकि उनके उपदेश जीवमात्र के कल्याण करने वाले थे। डॉ जैन ने विविध साहित्यिक विधाओं में रचित प्राकृत भाषा के साहित्य का उल्लेख, भाषा वैज्ञानिक अध्ययन एवं उसके माधुर्य को बताते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा इनके अध्ययन के बिना अधूरी है। खारवेल, अशोक आदि के प्राकृत शिलालेखों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनके अध्ययन से हमें भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं सांस्कृतिक जीवन का ज्ञान होता है। इसके साथ ही उन्होंने प्राच्य भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु, नई शिक्षा नीति 2020 के तहत इनके पठन-पाठन के लिए सरकार द्वारा उठाए गए निर्णय की भी प्रशंसा की।
सीमित न करें अध्ययन
इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से विद्वानों ने हिस्सा लिया । जैन दर्शन एवं प्राकृत के वरिष्ठ विद्वान् प्रो. फूलचन्द जैन प्रेमी ने भी अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्राच्य भाषाओं को किसी संप्रदाय से जोड़कर, इसके अध्ययन को सीमित नहीं करना चाहिए । अर्धमागधी, मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री की तरह पालि भी प्राकृत की ही शाखा है। अनेक संस्कृत विद्वानों ने प्राकृत साहित्य रचा, नाटकों में प्राकृत भाषा का प्रयोग किया है। अतः भारतीय संस्कृति को सम्यक् समझने के लिए प्राकृत का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। इस कार्यक्रम में देश के कोने-कोने से अनेक विद्यार्थियों, शोधार्थियों, भाषाविदों आदि ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया एवं उपस्थित विद्वानों के समक्ष अपनी जिज्ञासाएं, प्रश्न आदि रखकर समाधान प्राप्त किया।
उत्साह से सीखें प्राकृत भाषा
अंत में कार्यक्रम के संयोजक डॉ. अरिहन्त कुमार जैन ने उपस्थित सभी लोगों से अपील करते हुए कहा कि जिस तरह हम अवकाश आदि का सदुपयोग करते हुए जर्मन, फ्रेंच, चाइनीज आदि कठिन विदेशी भाषाओं को भरपूर उत्साह से सीखते हैं, कोर्स करते हैं, वही उत्साह हमें प्राकृत आदि प्राच्य भाषाओं को भी सीखने के प्रति भी होना चाहिए, जिसके पाठ्यक्रम आज अनेक विश्वविद्यालयों, संस्थानों आदि में सहज उपलब्ध हैं। अतः हमें जागरूक होने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का समापन करते हुए आमंत्रित मुख्य वक्ता एवं उपस्थित विद्वानों का धन्यवाद ज्ञापन वर्षा शाह ने किया।













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