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9वीं शताब्दी में रचना हुई थी सिरि भूवलय ग्रंथ की: ग्रंथ में विपुल साहित्य का अपार भंडार संस्कृति का परिचायक 


इंदौर के इतिहास में पहली बार सिरि भूवलय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन शनिवार और रविवार को होने जा रहा है। इसमें देशभर के नामी विद्वानों को आमंत्रित किया गया है। यह आयोजन दिगंबर जैन समाज के धार्मिक ग्रंथों और संस्कृति को एक नई दिशा प्रदान करेगा। इस आयोजन के निमित्त इस आलेख के जरिए हम भूवलय के बारे में संक्षेप में जानते हैं। इंदौर से पढ़िए, श्रीफल जैन न्यूज के उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह विशेष संकलित प्रस्तुति…


इंदौर। इंदौर के इतिहास में पहली बार सिरि भूवलय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन शनिवार और रविवार को होने जा रहा है। इसमें देशभर के नामी विद्वानों को आमंत्रित किया गया है। यह आयोजन दिगंबर जैन समाज के धार्मिक ग्रंथों और संस्कृति को एक नई दिशा प्रदान करेगा। इस आयोजन के निमित्त इस आलेख के जरिए हम भूवलय के बारे में संक्षेप में जानते हैं। इंजीनियर अनिलकुमार जैन के अनुसार 9वीं शताब्दी में आचार्य कुमदेंदु द्वारा विरचित सर्व भाषा मय अंकाक्षर काव्य सिरि भूवलय एक अद्भुत एवं संपूर्ण विश्व में अद्वितीय रचना है। यह अतिश्योक्ति नहीं है कि विशिष्ट ऋद्धियों के धारी विलक्षण ऋषियों ने ही इस प्रकार के शास्त्रों के शास्त्र की परिकल्पना की और उसकी रचना संभव हो पाई। अंकलिपि की जटिलताओं की वजह से यह ग्रंथ पिछले सहस्त्र वर्षों से विलुप्त ही रहा। करीब 70 वर्ष पहले इस ग्रंथ की एकमात्र उपलब्ध प्रति को पंडित येल्लप्पा शास्त्री ने अथक प्रयासों से समझने में सफलता पाई और अन्य विद्वानों के सहयोग से इसे प्रचारित भी किया। दुर्भाग्य से पंडित येल्लप्पा के असमय देहांत के बाद इस ग्रंथ पर जरूरी शोध और प्रचार पर विराम सा लग गया।

संपूर्ण रचना 9 खंडों में विभाजित 

सिरि भूवलय की संपूर्ण रचना नौ खंडों में की गई। इसमें प्रथम खंड मंगल प्राभृत के अलावा अन्य आठ खंडों के नाम श्रुतावतार, सूत्रावतार, प्राणावय पूर्व, धवल, जय धवल, विजय धवल, महाधवल और अतिशय धवल हैं। वर्तमान में प्रथम खंड मंगल प्राभृत ही प्राप्त है और इसी खंड पर पंडित येल्लप्पा शास्त्री के किए कार्य की सामग्री शोधार्थियों के लिए उपलब्ध है। प्रथम खंड में अंतर्निहित विपुल साहित्य राशि से अनुमान किया जा सकता है कि संपूर्ण ग्रंथ अब तक उपलब्ध प्राचीन भारतीय साहित्य में ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य में भी सबसे वृहदाकार कृति होने का सम्मान भी प्राप्त करता है।

ग्रंथ का प्रमुख घटक चक्र कहलाता है

इस ग्रंथ की संरचना के सबसे प्रमुख घटक को चक्र कहा जाता है। जिसे सामान्य शब्दों में किसी ग्रंथ के एक पृष्ठ के तुल्य माना जा सकता है। यहां प्रमुख विशेषता यह है कि चक्र में किसी भी अक्षर और वर्ण का प्रयोग नहीं हुआ है। मात्र अंकों के प्रयोग से ही अंक लिपि सुंदरी लिपि में लिखा गया संपूर्ण विश्व का एकमात्र ग्रंथ है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि संपूर्ण सिरि भूवलय के 9खंडों का विस्तार 16 हजार चक्रों में फैला हुआ है। एक चक्र में 27 पंक्तियां होती हैं और प्रत्येक पंक्ति में 27 पूर्ण अंकों की एक श्रृंखला होती है। प्रत्येक चक्र को 729 अंकों से संयोजित किया गया है। इस तरह की संरचना को आधुनिक गणित की शब्दावली में मैट्रिक्स कहते हैं। आचार्य कुमुदेंदु ने एक चक्र को 9 उपचक्रों में भी विभाजित किया है। जिसे आधुनिक गणित में मैट्रिक्स पार्टिशनिंग या सब मैट्रिक्स अथवा ब्लॉक मैट्रिक्स कहा जाता है। वर्तमान में मैट्रिक्स संकल्पना का आधुनिक विज्ञान के सभी क्षेत्र में विस्तृत प्रयोग हो रहा है। उल्लेखनीय है कि आधुनिक गणित में इसका अन्वेषण मात्र डेढ़ सौ वर्ष पहले का ही है,जबकि आचार्य कुमुदेंदु ने करीब 1200 वर्ष पहले इसको सिरि भूवलय की संरचना का आधार बनाकर विश्व का सबसे वृहद ग्रंथ की रचना की।

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