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आचार्य आर्जवसागर सभामंडप में सिद्धचक्र महामंडल विधान : आचार्य श्री आर्जवसागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य में घटयात्रा ध्वजारोहण से हुआ विधान का शुभारंभ


आचार्य श्री आर्जवसागरजी महाराज ससंघ के पावन सानिध्य में अष्टान्हिका महापर्व के दौरान श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र कोठी, तारंगाजी में सिद्धों की आराधना का स्रोत सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ हुआ। श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव 24 फरवरी से 4 मार्च तक चलेगा। तारंगा से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


तारंगा। आचार्य श्री आर्जवसागरजी महाराज ससंघ के पावन सानिध्य में अष्टान्हिका महापर्व के दौरान श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र कोठी, तारंगाजी में सिद्धों की आराधना का स्रोत सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ हुआ। श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव 24 फरवरी से 4 मार्च तक चलेगा। सुंदर अरावली पर्वत मालाओं से सुशोभित वरदत्त, सायरदत्त, वरांग आदि साढ़े तीन करोड़ महामुनिराजों की निर्वाण भूमि सिद्धक्षेत्र में आचार्य श्री आर्जवसागरजी ससंघ के साथ आर्यिका श्री पवित्रमति माताजी ससंघ तथा आर्यिका श्री सुदृढ़‌‌मति माताजी ससंघ का सानिध्य भी प्राप्त हो रहा है। महामंडल विधान के प्रथम दिन घटयात्रा निकाली गई। इसके बाद ध्वजारोहण अनिला बेन कमलेश भाई दोशी ननानपुर ने किया। सभी क्रियाएं विधि पंडित शैलेंद्र शास्त्री के कुशल निर्देशन में हुई। ध्वजारोहण के बाद आचार्य श्री मंच पर आसीन हुए। संघस्थ बहन बाल ब्रह्मचारी ऋषिका दीदी दमोह ने आचार्य भगवन् की मांगलिक पूजन किया, जो भक्ति उल्लास के साथ संपन्न हुआ।

आचार्य श्री ने बताया सिद्धचक्र महामंडल का महत्व

आचार्य भगवंत ने बताया कि सिद्धचक्र अर्थात् सिद्ध परमेष्टि के समूह की आराधना। इसी मांगलिक पलों में आचार्य श्री ने कहा कि वे पूर्व में 2012 में भी यहां आए थे और 2015 का चातुर्मास भी यहां हुआ था, जिसमें अनेक विधान, अनेक कार्यक्रम आदि बड़े ही हर्षाेल्लास पूर्वक हुए थे। उस समय 3 मुनि दीक्षा एवं 2 आर्यिका दीक्षा भी संपन्न हुई थी। सिद्ध चक्र महामंडल विधान के विषय में कहा कि यह सिद्धों की आराधना का बहुत महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। यह महामंडल विधान करने से श्रीपाल जैसे 700 कुष्ठ रोगियों का कुष्ठ रोग दूर हुआ था। प्रभु की भक्ति के विषय में कहा कि प्रभु की भक्ति में वह शक्ति होती है, जो मुक्ति का कारण बनती है। इन पर्व के दिनों में यह अनुष्ठान करने का विशेष महत्व है, इसके द्वारा पुण्य वृद्धि और कर्म निर्जरा होती है।

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