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उज्जैन तपोभूमि पर श्रुतपंचमी महोत्सव : दर्पण में देखकर किया अभिषेक, शांतिधारा की


उज्जैन तपोभूमि में श्रुत पंचमी महोत्सव में जिनवाणी एवं ग्रंथ का अभिषेक शांतिधारा दर्पण में देखकर की गई। जिनवाणी मां को पालने में झुलाया गया। उज्जैन से पढ़िए, यह खबर…


उज्जैन। श्रुतपंचमी से जैन ग्रंथ को लिपिबद्ध किया गया था। आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज ने कहा कि इस दिन जैन ग्रंथों को लिपिबद्ध किए जाने के कारण यह दिवस महापर्व के रूप में विख्यात है। बताया गया कि श्रुतपंचमी के अवसर पर साधु संतों को रोकने के लिए आदि सागर अंकक्लिकर भवन का भूमि पूजन किया गया। मुनि श्री पूज्यतीर्थ सागर जी महाराज के देवलोक गमन पर छतरी एवं चरण पादुका का निर्माण हुआ। ग्रंथालय में ग्रंथ की पूजा कर धर्म ध्वजा पहरी गई। तपोभूमि उज्जैन में आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज के सानिध्य में श्रुतपंचमी महोत्सव धूमधाम से मनाया गया। सुबह से ही आचार्य श्री के सानिध्य में कली कुंड पार्श्वनाथ भगवान के यहां पर अभिषेक शांति धारा के बाद नित्य नियम की पूजा के साथ-साथ अनेक कार्यक्रम आयोजित हुए। समाज सचिव मीडिया प्रभारी सचिन कासलीवाल ने बताया कि आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज संघ के साथ ग्रंथालय पहुंचे और वहां पर ग्रंथ की पूजा के पश्चात पांच धर्म ध्वजा लहराई गई। तत्पश्चात जिनवाणी मां एवं शास्त्रों ग्रंथ का पूजन करते हुए उनका अभिषेक एवं शांतिधारा दर्पण में देखकर समाज के प्रत्येक व्यक्ति ने किया। जिनवाणी मां को पालने में रखकर संपूर्ण समाज ने पालना भी झुलाया तत्पश्चात मुनि श्री का आहार हुआ। जिसमें सैकड़ो समाज के गुरु भक्त सम्मिलित हुए।

श्रुतपंचमी के अवसर पर साधु संतों को रोकने के लिए आदि सागर अंकक्लिकर भवन भूमि पूजन कुलगुरु अर्पण भारद्वाज, संस्थापक अध्यक्ष अशोक जैन चायवाला, अध्यक्ष दिनेश जैन सुपर फार्मा, सचिव संजय बड़जात्या, समाज सचिव एवं मीडिया प्रभारी सचिन कासलीवाल, पलाश लुहाड़िया, अनिल कासलीवाल, विमल पुष्पराज जैन आदि समाज के प्रमुख लोगों द्वारा किया गया। मां जिनवाणी को पालना झूलने का कार्य अर्पण भारद्वाज एवं समाज के गणमान्य नागरिकों द्वारा किया गया। मुनि श्रीपूज्यतीर्थ सागर जी महाराज के देवलोक गमन पर छतरी एवं चरण पादुका का निर्माण हुआ।

मेरा जल, मेरा जीवन कार्यक्रम रविवार को 

रविवार को आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी महाराज का विहार राजस्थान की ओर होगा। उज्जैन में सर्वप्रथम पड़ाव यूनिवर्सिटी (डिपार्मेंट सर्किट हाउस के सामने) के प्रांगण में 1100 पौधरोपण कार्यक्रम का शुभारंभ एवं जल संवर्धन जल को बचाने को लेकर ‘मेरा जल, मेरा जीवन’ सर्वप्रथम कार्यक्रम सुबह 7 बजे से किया जाएगा।

श्रुत पंचमी- ज्ञानामृत महापर्व

समाज सचिव मीडिया प्रभारी सचिन कासलीवाल ने बताया कि श्रुत पंचमी पर्व जैन धर्म में महापर्वों की श्रेणी में आता है। जैन धर्म एक ऐसा अनादिनिधन धर्म है। जिसमें सर्वाधिक पर्व आते हैं। ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है। जिसमें 250 से अधिक पर्व और महापर्व आते हों, एक मात्र जैन धर्म है। जिसमें वर्ष में 250 से अधिक पर्व व महापर्व आते हैं। जैन धर्म में सच्चे-देव शास्त्र-गुरु की पूजा आराधना होती है, सच्चे देव यानि हमारे तीर्थंकर भगवन्त जिन्होंने सभी प्रकार के कर्मों का क्षय कर ‘मोक्ष’ पद प्राप्त किया और तीर्थकर प्रकृति का बन्ध प्राप्त कर जन्म लिया। सच्चे शास्त्र यानि आगम प्रमाण, तीर्थकरों की वाणी जो आज हमें पढ़ने को मिलती हैं। सच्चे गुरू यानि निर्गन्थ सच्चे वीतरागी, मूलाचार आगम के अनुसार जिनकी चर्या है, ऐसे देव-शास्त्र-गुरू की पूजा की जाती है। आज वर्तमान पीढ़ी को इन पर्व व महापर्वों के बारे में ज्ञान होना अति आवश्यक है। इन पर्वों में एक महान और अनूठा पर्व है श्रुत पंचमी। जो प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी को सम्पूर्ण जैन समाज मनाता है। इस पर्व में शास्त्र, जिनवाणी यानि ज्ञान की पूजा होती है। हम सबको श्रुत पंचमी के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है ज्ञान होगा तभी हम इस महापर्व को मनायेंगे। यह पर्व प्राकृत भाषा पर्व भी कहते हैं और ज्ञानामृत पर्व भी कहते हैं।

भविष्य में भी 24 तीर्थकर होंगे

आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि जैन धर्म अनादिनिधन धर्म है इसमें तीर्थकर भगवन्त होते हैं, जो हर काल में 24-24 होते हैं तीर्थकर भूतकाल के हो चुके हैं, भविष्य में भी 24 तीर्थकर होंगे। यह आगम प्रमाण है यानि केवली, तीर्थकर भगवन्तों की वाणी है। वर्तमान में 24 तीर्थकर हुए हैं, वर्तमान काल चल रहा है। जिसमें अन्तिम तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी हुए है और प्रथम तीर्थकर भगवान ऋषभदेव हुए हैं और इस प्रकार हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता भगवान ऋषभदेव हैं। जिन्होंने मानव जगत को रहन-सहन की विभिन्न कलायें सिखाई।

दिव्य ध्वनि ओमकार रूप में खिरती है

अन्तिम तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के पश्चात 683 वर्ष तक श्रुत परम्परा यानि सुनने की परम्परा चली आ रही थी यानि भगवान महावीर स्वामी की वाणी गुरू-शिष्य परम्परा से प्रभावित होती रही।

भगवान को जब केवलज्ञान की प्राप्ति हो गयी तब इंद्रों ने (कुबेर, सोधर्म इन्द्र) समवशरण की रचना की, भगवान का समवशरण यानि धर्मसभा लगती है, तब उनकी दिव्य ध्वनि अनेकों भाषाओं में ओमकार रूप में खिरती है। जिसे गणधर भगवन्त सुनते हैं, ग्रहण करते हैं, शब्द रूप में प्रस्तुत करते हैं जो सच्चे आगम, सच्चे शास्त्र है।

 श्रुत परम्परा लिपिबद्ध होना अति आवश्यक 

श्रुत परम्परा भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के पश्चात कुछ वर्षों तक रही। जैनाचार्यों ने जब यह अनुभव किया कि शिष्य वर्ग की स्मरण शक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होती जा रही है जिनवाणी यानि जिन आगम को कैसे सुरक्षित रखा जाय, यदि इसको सुरक्षित नहीं किया गया तो जिनागम, जिनवाणी समाप्त हो जाएगी, अतः उक्त परम्परा को शताब्दियों तक अबाध रूप से करने के लिए लिपिबद्ध होना अति आवश्यक है।

भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के पश्चात 3 अनुरुद्ध केवली हुए , इन्द्रभूति गणधर को केवलज्ञान हुआ। 12 वर्ष पश्चात सुधर्माचार्य जी को केवलज्ञान हुआ। 12 वर्ष बाद अनुबद्ध केवली जम्बू स्वामी हुए जिन्होंने मथुरा चौरासी (उत्तरप्रदेश) से निर्वाण प्राप्त किया।

ज्ञान आचार्य परम्परा से धरसेना जी को प्राप्त हुआ

श्रुत केवली विष्णु कुमार, श्री नन्दिमित्र, श्री अपराजित जी, श्री गोवर्धन जी, एवं अंतिम श्रुत केवली श्री भद्रबाह जी थे आचार्य पूर्व द्वादशांग के ज्ञाता श्रुत केवली हुए। तदन्तर ग्यारह अंग और दश पूर्वों के नेता विशाखाचार्य जी, प्रोष्ठिनजी, क्षत्रिय जी ,जयनाग जी, सिद्धार्य जी, धृति सेन जो, विजय जी, बुद्धिल जी, गंगदेव जी और धर्मसेन जी आचार्य हुए तत्पश्चात नक्षत्र जी, जयपाल जी, पाण्डु जी, ध्रुवसेन जी , कंस जी ये 5 आचार्य ग्यारह अंगों के धारक हुए। तदन्तर सुभद्र जी, यशोभद्र जी, यशोबाहु जी ओर लोहार्य जी ये चार आचार्य जी एक मात्र आचरंग के धारक हुए।

इसके पश्चात अंग और पूर्व वेत्ताओं की परम्परा समाम हो गयी। और सभी अंगों और पूर्वों के एक देश का ज्ञान आचार्य परम्परा से धरसेनाचार्य जी को प्राप्त हुआ।

मुनियों की विद्यामंत्र देकर परीक्षा ली

धरसेनाचार्य जी गिरनार पर्वत की गुफा में रहते हुए, उनके मन में श्रुत संरक्षण का विचार आया और उन्होंने निमित्त ज्ञान से अपनी अल्पायु जानकर श्रुत की रक्षार्य महिमानगरी में एकत्रित मुनिसंघ के पास एक संदेश भेजा, मुनि संघ ने उस संदेश की पालना में, दो मुनियों को गिरनार भेज दिया, श्री धरसेनाचार्य जी ने उन मुनियों की विद्यामंत्र देकर परीक्षा ली, एक मुनिको एक अक्षर अधिक व एक को एक अक्षर कम वाला विद्या मंत्र देकर परीक्षा ली, और उपवास सहित साधने को कहा उन्होंने साधना की। उन मंत्रो में त्रुटि का आभास हुआ और सही कर पुनः साधना की और साधना पूर्ण कर आचार्य श्री को उनकी सुपात्रता का आभास हो गया। उन्हें अपना शिष्य बनाकर उसको सैद्धान्तिक देशना दी और उन शिष्यों का नाम भूतिवली और पुष्पदन्त रखा गया।

ग्रंथ को पालकी में विराजमान कर शोभायात्रा निकाली

आचार्य श्री पुष्पदंत जी महाराज ने जिनवाणी का लेखन प्रारंभ किया और 5 खण्ड सूत्र रूप में लिखे, दूसरे शिष्य भूतवली जी ने छठा खण्ड विस्तार से लिखा इस प्रकार छः खण्ड छः हजार श्लोक प्रमाण छः खण्ड यथा जीव स्थान, क्षुद्रकबंध, बन्ध स्वामित्व, वेदनाखण्ड, वर्गणा खण्ड, महाबन्ध यानि षट्‌खण्डागम ग्रन्थ की रचना हुई और ज्येष्ठ शुल्क पंचमी के दिन चतुर्विध संघ सहित कृतिक्रम पूर्वक महापूजन की गयी और इसी ग्रंथ को पालकी में विराजमान कर भव्य शोभायात्रा निकाली गयी। तभी से इसी दिन से श्रुत परम्परा को लिपिबद्ध परम्परा के रूप में प्रारम्भ किया गया और श्रुत आराधना, श्रुत पंचमी के रूप मनाते आ रहे है।

ये ही जिनवाणी आगाम वाणी है

अतः यह दिवस शास्त्र उन्नयन के अन्तर्गत श्रुत पंचमी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रुत और आराधना का यह महान पर्व हमें वीतरागी संतों की वाणी , आराधना और प्रभावना का सन्देश देता है। बन्धुओं हमारे गुरु आचार्यों की कठोर तपस्या का ही फल है। आज हम सभी को जिन भगवन्तों, तीर्थंकरों की वाणी ग्रन्थ , शास्त्र रूप में पढ़ने को मिल रही है। ये ही जिनवाणी आगाम वाणी है, उसी प्रकार से शास्त्र पूज्यनीय है। जिस प्रकार हम अपने आराध्य देव व गुरुओं को पूजते हैं।

हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि जैन कुल में हमारा जन्म हुआ है तो हम इन शास्त्रों को जिनवाणी माँ को नित्य प्रतिदिन पढें, स्वाध्याय करें, छोटे-छोटे बालकों को युवा पीढी को संस्कारित करें, जिनवाणी की धूम-धाम से शोभायात्रा निकालें। शास्त्रों का संरक्षण देखभाल, शास्त्र भंडारों की सफाई अपनी इस अमूल्य निधि की सुरक्षा होनी चाहिए जिस श्रद्धा से हम हमारे आराध्यों की यथा देव, गुरु की पूजा करते हैं उसी प्रकार जिनकी माँ की पूजा हो।

 महत्वाकांक्षी कार्यक्रम: मेरा जल, मेरा जीवन – वर्षा जल संचयन

रविवार को विक्रम विश्वविद्यालय वर्षा जल संचयन के लिए अपने एक प्रमुख कार्यक्रम ‘मेरा जल, मेरा जीवन’ का शुभारंभ करने जा रहा है। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रज्ञासागर जी महाराज के आशीर्वाद से होगा। यह पहल परिसर में 1x1x1 मीटर के गड्ढे खोदकर वर्षा जल को भूमि में वापस पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू की जा रही है।

कार्यक्रम का महत्व

“मेरा जल, मेरा जीवन” कार्यक्रम विश्वविद्यालय परिसर में जल संरक्षण और सततता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वर्षा जल संचयन एक प्रभावी तरीका है जिसके माध्यम से हम प्राकृतिक रूप से उपलब्ध जल का सदुपयोग कर सकते हैं और भूजल स्तर को बढ़ा सकते हैं

1x1x1 मीटर के वर्षा जल संचयन गड्ढे

इन गड्ढों का निर्माण परिसर के विभिन्न क्षेत्र (छतों, पक्के रास्तों, लॉन आदि) से बहने वाले वर्षा जल को एकत्रित करने के लिए किया जाएगा। एकत्रित जल धीरे-धीरे जमीन में रिसकर भू-जल भंडार को पुन: भर देगा।

 आकार : 

प्रत्येक 1x1x1 मीटर का गड्ढा 1 घन मीटर या 1000 लीटर पानी संग्रहित करने की क्षमता रखेगा।

 स्थान : 

गड्ढों का स्थान उनकी प्रभावशीलता के लिए महत्वपूर्ण है। इन्हें उन क्षेत्रों में बनाया जाना चाहिए। जहाँ वर्षा जल का बहाव अधिक हो और मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता अच्छी हो। भवन की नींव के पास इन्हें बनाने से बचना चाहिए ताकि पानी के कारण नुकसान न हो।

 रखरखाव : 

गड्ढों का नियमित रखरखाव आवश्यक है ताकि वे ठीक से कार्य करते रहें। इसमें जमा हुई पत्तियां, कचरा या गाद को साफ करना शामिल है जो पानी के रिसाव को रोक सकते हैं। समय-समय पर गाद निकालना भी आवश्यक हो सकता है।

 भू-जल वृद्धि:

घटते भूजल स्तर को फिर से भरने में मदद मिलेगी, जिससे दीर्घकालिक जल उपलब्धता सुनिश्चित होगी। यह उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहाँ पानी की कमी है या भू-जल मुख्य स्रोत है।

 जलभराव में कमी : 

सतह पर बहने वाले वर्षा जल को सोखकर, ये गड्ढे परिसर के निचले इलाकों में जलभराव को कम करने में मदद कर सकते हैं।

 जल गुणवत्ता में सुधार : 

जब वर्षा जल मिट्टी की परतों से रिसता है, तो यह प्राकृतिक रूप से फिल्टर होता है, जिससे भूजल की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

 पर्यावरण स्थिरता : 

जल प्रबंधन के लिए एक टिकाऊ दृष्टिकोण को बढ़ावा मिलता है और दूर के स्रोतों से पानी निकालने और परिवहन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव कम होते हैं।

 शैक्षणिक महत्व :

यह पहल छात्रों और व्यापक समुदाय के लिए जल संरक्षण और टिकाऊ प्रथाओं के महत्व को समझने के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण के रूप में कार्य कर सकती है।

 प्रायोजन की आवश्यकता:

इस कार्यक्रम की सफल कार्यान्वयन और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए प्रायोजन महत्वपूर्ण है। इस कार्य की निरंतर देखरेख और सहयोग की आवश्यकता है। विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा यह पहल एक जल-सचेत संस्थान बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। व्यावहारिक बुनियादी ढांचे के विकास को सामुदायिक जुड़ाव और जागरूकता के साथ जोड़कर, “मेरा जल, मेरा जीवन” कार्यक्रम में स्थायी सकारात्मक प्रभाव पैदा करने की क्षमता है।

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