श्रुतपंचमी पर्व शास्त्र-जिनवाणी का पर्व है। वर्ष में शास्त्र का यह एक मात्र पर्व आता है। आज के दिन सैकड़ों वर्ष पूर्व जिनवाणी का लेखन कार्य समाप्त हुआ था। इस पंचम काल में साक्षात् तीर्थंकर भगवान विद्यमान नहीं हैं, इसलिए उनकी दिव्यवाणी ही हम सबकी परम हितकारी है। हमारे तीर्थंकरों ने अपने केवलज्ञान में जितना जाना, उनका अनन्तर्वा भाग उनकी दिव्यध्वनि में खिरा। भगवान की दिव्यध्वनि में जितना खिरा, उनका अनन्तर्वा भाग गणधर ने धारण किया। गणधर देव ने जितना धारण किया, उनका अनन्तर्वा भाग उन्होंने द्वादशांग रूप जिनवाणी में गूंथा। परंपरागत आशतीय आचार्यों के माध्यम से भगवान की दिव्यध्वनि का एक अंश आज हमें उपलब्ध है। यह परम वाणी पंचेन्द्रिय विषयों का विरेचन कराने वाली परम औषध स्थानीय है।
अनन्तानन्त तीर्थंकरों की दिव्यध्वनि एक सदृश है। इस हुंडावसर्पिणी काल में 18 कोड़ा-कोड़ी सागर काल के पश्चात् भरतक्षेत्र में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ स्वामी के द्वारा धर्मतीर्थ का प्रवर्तन हुआ। आठवें तीर्थंकर पर्यन्त यह तीर्थ प्रवर्तन अनवरत चला। नवें तीर्थंकर से लेकर 15वें तीर्थंकर के तीर्थ काल में कुछ-कुछ समय के लिए धर्म का विच्छेद हुआ। पुन: अगले तीर्थंकर के द्वारा धर्म का स्थापन हुआ। शांतिनाथ तीर्थंकर से लेकर आज तक धर्मतीर्थ की परंपरा अनवरत जारी है। चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान स्वामी को वैशाख शुक्ल दसवीं को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। भगवान की दिव्यध्वनि को झेलने वाला उनका कोई स्वयं दीक्षित शिष्य न होने से 66 दिन तक भगवान की वाणी नहीं खिरी। इंद्र को बहुत चिंता हुई, अवधिज्ञान के माध्यम से जानकर वे सीधे गौतम ग्राम में पहुंचे, जहां गौतम नामक ब्राह्मण अपने शिष्यों को पढ़ा रहा था। वह ब्राह्मण स्वयं अपने को सबसे ज्यादा ज्ञानी समझता था। बहुत घमंड-अभिमान में चूर-चूर हो रहा था। इंद्र ने एक श्लोक
‘त्रैकाल्य द्रव्यषट्कं नवपदसहितं जीवषट्काय लेश्या:।
पश्चान्ये चास्तिकाया व्रतसमिति गुस्तिज्ञानचारितभेदा:।।’
का अर्थ पूछा। छह द्रव्य, नव पदार्थ, छह काय, पांच अस्तिकाय आदि शब्दों को प्रथम बार सुनने से उन सबका अर्थ मालूम नहीं था। ज्ञान के अहंकार के कारण ‘मैं नहीं जानता हूं’ ऐसा तो नहीं बोल सकता था, अत: इंद्र को कहा कि चलो मैं तुम्हारे गुरु के साथ शास्त्रार्थ करूंगा, तुम क्या जानते हो? इंद्र तो यही चाहता था कि ये भगवान के समवशरण में पहुंचे। समवशरण में मानस्तंभ देखते ही ब्राह्मण का मान खंडित हुआ। भगवान के दर्शन होते ही मिथ्यात्व रूपी अंधकार का नाश हुआ एवं सम्यक्त्य का प्रकाश हुआ। भगवान की वाणी को झेलने वाला पात्र उपलब्ध होते ही दिव्यध्वनि खिरी। महावीर स्वामी के निर्वाण के पश्चात् तीन अनुबद्ध केवली 62 वर्ष में हुए। उनके पश्चात् पांच श्रुतकेवली हुए। संपूर्ण द्वादशांग के ज्ञाता अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी ने श्रवणबेलगोला स्थित चंद्रगिरि की पहाड़ी पर अपनी अंतिम साधना समाप्त कर समाधिमरण को प्राप्त किया।
भद्रबाहु स्वामी के पश्चात् श्रुत का धीरे-धीरे ह्रास होता गया। भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के पश्चात् लगभग 643 वर्ष हुए, तब गिरिनगर की चंद्रगुफा में आचारांग के एकदेश ज्ञाता धरसेनाचार्य हुए। उन्होंने अपने निमित्त ज्ञान से जाना कि मेरी आयु अति अल्प है। मेरे साथ मेरा ज्ञान चला जाएगा। श्रुतसंरक्षण की चिंता से युक्त धरसेनाचार्य ने महिमा नगरी के यति सम्मेलन में स्थित आचार्यों को पत्र दिया, ‘ऐसे दो ज्ञानी विद्वान मुनिराजों को यहां भेज दो, जो मेरे ज्ञान को धारण कर सकें।’ पत्र प्राप्त होते हुए पुष्पदंत और भूतबलि नामक दो योग्य मुनिराजों को धरसेनाचार्य के पास भेजा गया। जिस दिन वे दोनों मुनिराज धरसेनाचार्य के पाद्मूल में पहुंचने वाले थे, उस रात्रि को धरसेनाचार्य के मुख से ‘जयदु सुददेवदा’ शब्द निकलते हैं। प्रात: काल स्वप्न के फलस्वरूप दोनों युवा मुनि धरसेनाचार्य के चरणों में पहुंचते हैं। तीन दिन के विश्राम के पश्चात् दोनों मुनिराजों ने धरसेनाचार्य को अनुनय-विनयपूर्वक निवेदन किया कि हम दोनों को किस कार्य के लिए याद किया गया है, हमारे लिए आपकी क्या आज्ञा है? धरसेनाचार्य ने अपने निमित्तज्ञान से जान लिया था कि ज्ञान ग्रहण करने में योग्य पात्र हैं परंतु फिर भी परीक्षा संतुष्टि देने वाली होती है, ऐसा विचारकर उन्होंने दोनों मुनिराजों को भिन्न-भिन्न मंत्र सिद्ध करने के लिए दिया। गुरुमंत्र को शिरोधार्य करके दोनों ने बेला (दो उपवास) उपन्यास पूर्वक मंत्र को सिद्ध किया। मंत्र सिद्ध होते ही एक मुनिराज के सामने कानी देवी उपस्थित हुई, दूसरे मुनिराज के सामने लंबे दांतवाली देवी उपस्थित हुई। देवता सुरूप ही होते हैं, कुरूप नहीं होते हैं। ऐसा विचारकर दोनों ने अपने-अपने मंत्र को पुन: देखा। एक मुनिराज के मंत्र में अनुस्वार की कमी थी तो दूसरे के मंत्र में एक मात्राअधिक थी, जिसके फलस्वरूप कानी और लंबे दांतवाली देवी उपस्थित हुई थीं। दोनों ने मंत्र शुद्ध कर बेला उपवासपूर्वक पुन: सिद्ध किया, जिसके फलस्वरूप दोनों के पास देवी प्रकट हुईं। उन देवियों ने कहा, हमारे लिए क्या आज्ञा है? दोनों मुनिराजों ने कहा कि हमें इहलोक संबंधी या परलोक संबंधी किसी प्रकार की आकांक्षा नहीं है, कोई ख्याति पूजा-लाभ की चाह नहीं है। गुरु चरणों में पहुंचकर हमने मंत्र को सिद्ध किया है। दोनों ने गुरु के चरणों में पहुंचकर यथावत सारी बात बताई। धरसेनाचार्य अत्यंत प्रसन्न हुए।
शुभ मुहूर्त, शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि, शुभ वार में धरसेनाचार्य ने दोनों मुनिराजों को आगम सिद्धांत का ज्ञान प्रदान करना प्रारंभ किया। दोनों मुनिराजों ने एकाग्रता पूर्वक श्रुत को शीघ्र अवधारण किया। आषाढ़ शुक्ल 11 को अध्ययन पूरा हुआ। उस दिन देवों ने आकर दोनों मुनिराजों की पूजा की। धरसेनाचार्य ने अपने निमित्त ज्ञान से जान लिया था कि मेरी आयु अति अल्प है, इस चातुर्मास काल में समाप्त हो सकती है। गुरु के वियोग से इन दोनों मुनिराजों को संक्लेश हो सकता है। संक्लेश से ज्ञान का हस हो सकता है। इस प्रकार विचार कर ज्ञान संरक्षण की चिंता से उन दोनों मुनिराजों को उसी दिन विहार कराया गया। उन दोनों ने गुजरात के अंक्लेश्वर ग्राम में चातुर्मास संपन्न किया। वहां से वे दोनों मुनिराज दक्षिण की ओर विहार करके करहार नगर पहुंचे। पुष्पदंत मुनिराज ने अपने भांजे जिनपालित को जिनदीक्षा देकर उनको षट्खंडागम के 100 सूत्रों का अध्ययन कराके लिपिबद्ध करके भूतबली मुनिराज के पास अवलोकनार्थ भेजा। भूतबली मुनिराज ने उनका अभिप्राय समझकर शेष आगे पांचों खंडों के सूत्रों को बनाकर लिपिबद्ध किया। जिस दिन षट्खंडागम के सूत्रों का कार्य संपन्न हुआ, उसी दिन देवों ने आकर शास्त्र और उन मुनिराज की बहुत बड़ी धूमधाम से चंदोवा वस्त्र, घंटा, चामर आदि द्रव्यों से पूजा की और शास्त्र को हाथी पर विराजमान कर जिनवाणी का जुलूस निकाला। वह दिन ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी का दिन था, उस दिन से यह श्रुतपंचमी पर्व मनाया जाता है। पश्चात् जिनपालित मुनि के माध्यम से पूरे षट्खंडागम के सूत्रों को पुष्पदंत मुनिराज के पास भेजा गया। उनको देखकर अपनी अंतरंग भावना की संपूर्ति देखकर पुष्पदंत मुनिराज को अतीव प्रसन्नता हुई। उन्होंने भी ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन श्रावकों के द्वारा महान उत्सवपूर्वक उन षट्खंडागम सूत्र रूप जिनवाणी-लिपिबद्ध शास्त्र की पूजा करवाई। उसी दिन से यह पर्व प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ।
आज के दिन सभी श्रावकों को अपने-अपने ग्राम में विराजमान जिनवाणी-शास्त्र को अच्छी तरह से सुव्यवस्थित करके श्रुत की पूजा करनी चाहिए। जीर्ण शास्त्रों को ठीक करके नए वेष्ट्न में बांधकर उनको सुरक्षित करना चाहिए। श्रुत की सुरक्षा, विनय हम सभी के लिए केवलज्ञान का बीज है। आज यह श्रुत ही हमारे लिए साक्षात् तीर्थंकर स्वरूप है, जो परंपरा से हमारे कार्मक्षय का कारण है।













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