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धर्म के पतन को रोकना हम सभी के हाथों में है : श्री सिद्ध क्षेत्र गिरनार जी मेरी दृष्टि में 


सिद्ध क्षेत्र गिरनार जी एवं पावागढ़ के दर्शन व भ्रमण करने का अवसर विगत दिवस मिला जो अनुभव व विचार मन में आए उन्हें टी के वेद सभी के साथ शेयर करना चाहते हैं। इसी भाव से उनकी यह लेख लिखने की भावना जागृत हुई। पढ़िए टी के वेद का यह विशेष आलेख….


गुजरात। प्रारंभ से ही जैन संस्कृति का केंद्र रहा है। यहां से 22वें तीर्थंकर 1008 नेमिनाथ भगवान का मोक्ष हुआ, इसके अतिरिक्त प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ के गणधर पुण्डरीक ने भी यही से मोक्ष प्राप्त किया, चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा गिरनार पर्वत पर चंद्र गुफा का निर्माण, गुफा में पूज्य आचार्य धरसेन की योग साधना, आचार्य धरसेन द्वारा आचार्य पुष्पदंत व आचार्य भुतबली को श्रुतज्ञान, राजा जयसिंह सिद्धराज द्वारा गिरनार पर्वत पर भगवान नेमिनाथ का मंदिर निर्माण आदि ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध है। तीर्थंकर नेमिनाथ के तीन कल्याणक, दीक्षा, केवल ज्ञान, और निर्वाण उर्जयन्त गिरी (गिरनार) से हुए। यह मात्र तीर्थंकर नेमिनाथ की निर्वाण स्थली ही नहीं है, वरन् 72 करोड़ 700 मुनि भी इसी क्षेत्र से निर्वाण गए हैं। इस संबंध में अनके प्रमाणिक अभिलेख विभिन्न ग्रंथों एवं न्याय दृष्टांतों में उपलब्ध है। इन सब ऐतिहासिक साक्ष्यो को यहां पुर्नउद्धरित करना मेरा आशय नहीं है। मैं मात्र वर्तमान स्थिति व समाज की दिशा व चिंतन पर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।

मेरी गिरनार यात्रा के दौरान मैंने अनुभव किया कि तलहटी पर स्थित 3 मंदिर हमारे आधिपत्य व नियंत्रण में है। समोशरण मंदिर 2.कमल मंदिर 3. वर्तमान चैबीसी मंदिर

इसके अतिरिक्त प्रथम टोक पर दिगंबर व श्वेतांबर मंदिर स्थित है इसके अतिरिक्त शेष सभी स्थानों टोंको पर सभी समाजों का अधिकार है।

प्रथम सीढ़ी से लेकर अंतिम सीढ़ी पांचवी टोक तक लगभग 500 से अधिक अन्य धर्मावलंबियों के पूज्य स्थान/मूर्तियां/मंदिर/स्थित है एक तरफ 500 पूज्य स्थान अन्य मतावलंबियों के हैं दूसरी और हमारे मात्र पांच स्थान, हम कहां टिक सकते हैं।

गिरनार जी आने वाले यात्रियों का यदि हम वर्गीकरण करें तो मेरे मोटे तौर पर वर्ष में आने वाले यात्रियों की संख्या इस प्रकार है।

1. जैन यात्री 30,000 दिगंबर

2. जैन यात्री 2,00,000 श्वेतांबर

3. अन्य यात्री 80,00,000 (अन्य मतावलंबियों)

कहां 80 लाख यात्री और कहां हम 2 से 2.5 लाख यात्री।

किस आधार पर हम लड़ाई लड़ रहे हैं।

राजनीतिक प्रभाव

हम उसे स्वीकार करें या ना करें परंतु यह सत्य है कि 2014 के पूर्व जो शासन व्यवस्था थी उसमें अल्पसंख्यकों के हित चाहे पूर्ण सुरक्षित ना हो परंतु फिर भी वे आंशिक रूप से संरक्षित थे। न्याय निर्णयों में भी शासन की भूमिका चाहे स्वीकारे या ना स्वीकारे महत्वपूर्ण होती है एवं 2014 के पूर्व के निर्णयों में हमारी बात सुनी गई है अब जो राजनीतिक दल सत्ता में है वे सैद्धांतिक रूप से जैन धर्म (श्रमण संस्कृति) का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते हैं उनके मत में जैन धर्म हिंदू धर्म (वैदिक संस्कृति) का ही एक भाग है, एवं उनकं सभी निर्णय इसी के आधार पर होते हैं।

सामाजिक संस्थाएं

पूरे भारतवर्ष में जितनी जैन सामाजिक संस्थाएं अस्तित्व में है या कार्यरत है उनमें कोई स्पष्ट कार्य विभाजन नहीं है सभी संस्थाएं सभी क्षेत्र में एक दूसरे की प्रतिस्पधी है। अपवाद स्वरूप कुछ सामाजिक संगठन सही दिशा मंे अग्रसर हेतु उनको पर्याप्त सहयोग नही मिलता है। ये संस्थाएं कम धर्म के नाम पर दुकाने कहना अधिक उपयुक्त होगा। समाज को मार्गदर्शन नेतृत्व प्रदान करना सही रास्ता दिखाना विस्तृत व लंबी गहरी सोच के साथ निर्णय लेना इन संस्थाओं का उद्देश्य होना चाहिए जिसका अभाव है। सभी संस्थाओं के दो-दो हिस्से पदों के बंटवारों में हो चुके हैं शेष संस्थाएं नाम मात्र की है जिनका कोई वास्तविक अस्तित्व धरातल पर नहीं है।

व्हाट्सएपवीर, क्रांतिकारी नेता

समाज में एक नया वर्ग और पैदा हो चुका है जिन्हें मैं व्हाट्सएप वीर कहता हूं। जो मात्र व्हाट्सएप तक ही सीमित है एवं समाज व धर्म का सर्वाधिक नुकसान इन्हीं कुकुरमुत्तो के वंशजों ने किया है हर कार्य का विरोध बिना आगे पीछे का विचार किये करना सही चाणक्य नीति नहीं है। अब वह जमाना भी नहीं हैं जब हमारे यहाँ ऐसे श्रमण हुए है जिन्होंने अपने आभा मण्डल/ प्रभा प्रमण्डल से निर्णयो को अपने पक्ष में प्रभावित किया है चाहे वह केन्द्र शासन हो या राज्य शासन, चाहे वह वरिष्ठतम न्यायालय हो या स्थानीय न्याय तंत्र शासन के हर कार्य का हर निर्णय का विरोध कर हम क्या पा लेगें?

गिरनार जी में जब रोप वे (उड़न खटोला) के निर्माण की कल्पना हुई 2007 मे तब पहली टोक पर एक स्टेशन प्रस्तावित था। दुसरी टोक पर दुसरा स्टेशन, हमने इसका पूर जोर विरोध किया। परिणायतः 2020 मे 13 साल मे यह कार्य, पूर्ण हुआ। अंततः केवल दुसरी टोक पर उड़न खटोला का स्टेशन बना। मैने स्वयं प्रथम टोक से दूसरी टोक जाने के लिये 1200 सीढी चढ़ने का 4000/- भुगतान किया सभी तीर्थो पर डोली वालो का आधिपत्य हो गया है। वे सभी मांसाहरी, जैन विरोधी है हम उनकी आय का साधन बन गये।

आज भी गिरनार की सभी टोकों पर डोली वाले 15000 से 20,000 प्रति व्यक्ति वसूल रहे हैं। हम मात्र डोली वाले को भुगतान कर अपनी धार्मिक यात्रा पूर्ण मानते हैं।

यही त्रुटि हम सम्मेदशिखरजी में दोहरा रहे हैं। किसी क्षेत्र को पर्यटन स्थल बनने से आप नही रोक सकते हैं। यह समय की मांग है हम विकास को विलम्बित कर सकते हैं, रोक नहीं सकते हैं। विकास को अपने अनुसार करवाया जा सकता है।

एक गैर मताबलंबी व जैन मतावलंबी में क्या फर्क है, हममें से 95 प्रतिशत रात्रि भोजन करते हैं, अभक्ष्य का त्याग नहीं है कोई नियम धर्म नहीं है। यात्रा मात्र मनोरंजन व सुखसुविधाओं के लिये करते हैं, जिन्हें धर्म का लेश मात्र भी ज्ञान नहीं है – शुद्ध णमोकार को उच्चारण भी नहीं कर सकते है। तीर्थों पर महंगी होटलों जैसी सुविधा चाहते हैं, वे तीर्थयात्री रहे ही कहां हैं? हम मात्र नाम के जैन हैं – हमारे कार्य व व्यवहार समाज के शेष वर्गो से किसी मान में उच्च नहीं है। यदि हम सर्वे करे तो पायेंगे कि समाज के 90 प्रतिशत घरों में एक जिनवाणी की पुस्तक भी नहीं मिलेगी। (जो निःशुल्क उपलब्ध है) तो स्वाध्याय तो बहुत दूर है। मंदिरों में समाज की संख्या का दो से तीन प्रतिशत पूजन अभिषेक करते हैं।

श्रमणो को भूमिका

धन्य हो आचार्य शान्तिसागरजी, विमल सागर जी, आचार्य विद्यानन्दजी जो अपने एक संदेश से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व बडे़ से बड़े से निर्णायकों को प्रभावित कर सकते थे अबतो अधिकांश श्रमणों के अपने मठ हैं, अपने प्रोजेक्ट हैं धर्म से ज्यादा रूचि उनकी इन प्रोजेक्टों में हैं। सामाजिक संस्थाओं का बंटाढार भी श्रमणों के प्रभाव में हुआ है। जब तक सामाजिक संस्थाओं का अपना नेत्तृत्व चुनने का अधिकार था। सामाजिक संस्थाओं का कार्य व्यवस्थित था अब तों पदों की बंदरबाट श्रमणों के निर्देशों पर होती है, श्रावकों से अधिक मान कषाय श्रमणों में है। तमिलनाडु में अर्हत गिरि पर आचार्य कुन्द-कुन्द के चरण विराजित हैं। किसी श्रमण की प्रेरणा से वहां जीर्णोद्वार हुआ उनका नाम का पटिया तीन जगह लगाया गया। क्या पिछले 2500 वर्षो मे कोई आचार्य नहीं हुए। जिन्होंने वहां जीर्णोद्वार कराया ? श्रमणों की यह मानसिकता श्रावकों को क्या संदेश देती है।

श्रावकों की भूमिका व सुझाव

1 हमें सामाजिक संस्थाओं में मात्र – उन्हीं पदाधिकारियों का चयन/मनोनयन करना है जो धर्म के सामान्य सिद्धान्तों रात्रि भोजन त्याग, अभक्ष्य त्याग, देवशास्त्र गुरु की उपासना करते हो – 95 प्रतिशत दुकान के रूप मे संस्था चलाने वाले छंट जाएंगे

2) कोई भी निर्णय हम लम्बी अवधि के पक्ष/विपक्ष को विचार कर ले तथा निर्णयों का प्रचार प्रसार काम होने के बाद हो।

3) श्रमणो का दायित्व – अपने धर्म उपदेश तक सीमित हों

4) देश काल परिस्थिति के अनुसार श्रावकों व श्रमणों की चर्या में परिवर्तन हो

5) समाज के पिछड़े व वह वर्ग जिसे समाज के सहयोग की आवश्यकता है, के लिये आवश्यक प्रावधान हो।

6) पंचकल्याणकों विधानों-पुस्तक प्रकाशनों का कार्य आवश्यकता पर व सीमित हो।

7) चार्तुमास की भव्यता धार्मिक संस्कारों में हो एवं चार्तुमास की व्यवस्था मंदिरों के माध्यम से हो जो अपने आय-व्यय का हिसाब प्रस्तुत कर सके व रख सके।

इन संबंधों में विचार अवश्य होना चाहिए। यह समय की आवश्यकता है अन्यथा धर्म के पतन को कोई रोक नही सकेगा व इसके लिये हमारी वर्तमान पीढ़ी जवाबदार होगी।

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