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श्रद्धा ने होने से सुख, शांति और समृद्धि में कमीःआचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज

आज का विचार

अगर जीवन में दुःख नहीं हो तो धर्म कोई करता ही नहीं

न्यूज सौजन्य- कुणाल जैन

प्रतापगढ़। आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज ने कहा है कि आज वैराग्य के भाव नहीं हो पा रहे हैं। धर्म, देव,गुरु पर श्रद्धा ही नहीं बन पा रही है। धर्म पर शंका हो रही है। इसीलिए परिवार में सुख, शांति और समृद्धि भी कम हो गई है। आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने 11 वर्ष के आयु में दीक्षा धारणकर और आत्मा का उपदेश दिया। इतनी कम उम्र में वैराग्य होना पुण्य का ही फल है।

दिगम्बर जैन नया मन्दिर में प्रवचन करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि धर्मयात्रा पर जाना हो और अचानक तुम्हारा कार्यक्रम कैंसल हो जाए। लेकिन पूरा परिवार चला जाए। दो दिन बाद खबर आए कि गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। गाड़ी में सवार सभी मरण को प्राप्त हो गए हैं। क्यों तुमने यह सोच लिया कि अगर यात्रा पर नहीं जाते तो यह नहीं होता। यह इसलिए हो क्योंकि तुम आजतक धर्म के प्रति श्रद्धावनत नहीं हुए और न ही तुम धर्म के सिद्धांतों को समझ पाए।
आचार्य श्री सुन्दर सागर महाराज ने आगे कहा कि अगर जीवन में दुःख नहीं हो तो तुम धर्म करो ही नहीं। अगर दुख है तो धर्म के नाम पर जो करना हो, कर लेते हो। जैसा गुरु कहते हैं, वह भी सब कर लेते हो। दान भी दे देते हो। अगर पास में नहीं है तो कहीं से लाकर दोगे। पर जब सुखी हो तो यह नहीं होता है। कई बहाने होते हैं।

यह भी कहा कि दुखों से वही बच सकता है जो अपनी आत्मशक्ति बढ़ाता है। आत्मशक्ति आत्मा की चर्चा करने से बढ़ती है। आत्मा का चिंतन संसार के कार्य करते नहीं हो सकते। आत्मचिंतन तो साधु अवस्था में ही सम्भव है। आचार्य जी ने अंत में कहा कि बात आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी और उनके आध्यात्मिक ग्रंथों की करते हैं पर उन जैसा आचार्य, त्याग और वैराग्य के भाव नहीं बना पा रहे हैं। जब तक उन जैसी श्रद्धा,आस्था नहीं होगी, तब तक उन जैसा नही बन पाएंगे। जैनधर्म चर्चा का चर्या का धर्म है।

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