विदिशा में विराजित मुनिश्री सर्वार्थसागरजी ने आचार्यश्री के जन्म जयंती पर स्मरण कर उनका गुणानुवाद किया। उन्हें संयम, शील और साधना का अमर पुंज बताया। मंगलवार को अपने प्रवचनों के दौरान आचार्य श्री की वंदना कर धर्मप्रेमी जनता ने भी पुण्यलाभ लिया। विदिशा से पढ़िए, यह खबर…
विदिशा। पट्टाचार्य विशुद्ध सागर महाराज जी ससंघ विदिशा में विराजमान हैं। उनके शिष्य मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी ने विदिशा में अपने प्रवचन में कहा कि आचार्य शांतिसागर, तप के ज्योतिर्मय प्रणेता, संयम, शील और साधना के अमर पुंज विधाता।
बीसवीं सदी में धर्म का दीप पुनः जलाया, मूलाचार का मार्ग दिखा, जीवन को अर्थ दिलाया।
चरणों में जिनके झुकता है समय भी नतमस्तक, गुरुता की प्रतिमा बने, जिनका आभास अलौकिक।
संन्यास में जिनकी महिमा रही चिर अमर अपार, उन प्रथमाचार्य को बारंबार वंदन अपार।
ध्यान, तप और त्याग की साक्षात मूर्ति बने, संयम पथ पर चलकर जग को दीपक जैसे तले।
प्रथमाचार्य का गौरव जिनसे फिर जाग उठा, जैन धर्म का स्वाभिमान जिनसे फिर भाग उठा।
गर्भ में भी तप की थी जिनकी पावन झलक, ऐसे संत थे वे, जैसे भगवान की कोई झलक।
मूलाचार के अनुशासन को जीवन बना डाला, धरा पर चलती साधना को स्वरूप बना डाला।
इधर, अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद, कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील ने बताया कि गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी के साक्षात तीन बार दर्शन करने वाली हैं गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी। गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी, जिन्होने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी के तीन बार दर्शन किए हैं। 1. नीरा (महाराष्ट्र ) में सन् 1954 में, 2. बारामती (महा.) में सन् 1955 में,3 कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र (महा.) में सन् 1955 में संल्लेखना के समय। सन् 1955 में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी ने कुंथलगिरि में देशभूषण-कुलभूषण जी की प्रतिमा के समक्ष 12 वर्ष की संल्लेखना ली थी। दिगम्बर साधु संत परम्परा में वर्तमान युग में अनेक तपस्वी, ज्ञानी ध्यानी संत हुए। उनमें आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज एक ऐसे प्रमुख संत श्रेष्ठ तपस्वी रत्न हुए हैं, जिनकी अगाध विद्वता, कठोर तपश्चर्या, प्रगाढ़ धर्म श्रद्धा, आदर्श चरित्र और अनुपम त्याग ने धर्म की ज्योति प्रज्वलित की है। आपने जो किया वह अभूतपूर्व है।













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