विरागोदय तीर्थ पथरिया में पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्ध सागर जी महाराज का मंगल चातुर्मास जारी है। धर्मसभा में उन्होंने कहा कि शौच धर्म का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं बल्कि आंतरिक लोभ का अभाव है। लोभ ही अनर्थों की जड़ है और शुचिता प्राप्त करने के लिए निर्लोभता आवश्यक है। संतोषी स्वभाव ही वास्तविक शौच धर्म का मार्ग है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
विरागोदय तीर्थ पथरिया (म.प्र.)। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष श्री अभिषेक अशोक पाटील ने बताया कि पट्टाचार्य विशुद्ध सागर महाराज जी ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ पथरिया में प्रारंभ हो चुका है। इस अवसर पर भक्त वैभव बडामलहारा ने जानकारी दी कि विरागोदय तीर्थ पथरिया में आयोजित धर्मसभा में पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने श्रावक संस्कार साधना शिविर में मंगलमय प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि उत्थान का विचार, मुक्ति की चाह, शांति का उपाय, शुचिता का भाव, पवित्र परिणाम, निर्मल परिणति और संतोषी स्वभाव ही शौच धर्म है। केवल पानी से तन पवित्र होता है लेकिन आत्मा की शुद्धि निर्लोभता से ही संभव है। सम्पूर्ण अनर्थों की जड़ लोभ है, और लोभ के वश होकर ही मानव अनेक पापाचरण करता है। लोभी व्यक्ति दान नहीं करता और अपने जीवन को धन संग्रह में व्यर्थ कर देता है।
दूसरों के दोष देखने से आत्म पतन
गुरुदेव ने कहा कि जिसे पवित्रता का बोध होगा वही शुचिता को प्राप्त कर पाएगा। दूसरों के दोष देखने से आत्म पतन होता है जबकि अपने दोष देखने से आत्म कल्याण होता है। उन्होंने समझाया कि एक-एक दोष छोड़ते जाने से व्यक्ति गुणवान बन जाता है। उन्होंने आगे कहा कि विकास के लिए विचारों में एकरूपता, नम्रता, सरलता और सामंजस्य आवश्यक है। भावों की पवित्रता के अभाव में शाश्वत सुख संभव नहीं है। दिगंबर मुद्रा ही वास्तविक शुचिता की मुद्रा है और वीतराग धर्म ही पवित्र धर्म है। पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी ने संदेश दिया कि आत्म शुद्धि के लिए आत्म बोध आवश्यक है। उत्तम शौच धर्म से ही आत्म शुचिता संभव है। संतोषी बनकर ही साधुता और वास्तविक शांति को प्राप्त किया जा सकता है। इस धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर प्रवचन का लाभ ले रहे हैं।













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