आचार्य श्री शांति सागर जी की मुनि दीक्षा फाल्गुन शुक्ल 14 को हुई थी। इस बार तिथि के अनुसार यह 14 मार्च को आ रही है। आचार्यश्री की मुनि दीक्षा महोत्सव को देशभर में श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। इस पर वर्ष पर्यन्त जिनालयों में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आचार्य श्री शांति सागर जी की मुनि दीक्षा महोत्सव फाल्गुन शुक्ल 14 के उपलक्ष्य में इंदौर से पढ़िए राजेश पंचोलिया की यह खबर…
श्री शांतिसागर जी महा मुनिराज का परिचय
दिगंबर साधु संत परंपरा में वर्तमान युग में अनेक तपस्वी, ज्ञानी ध्यानी संत हुए। उनमें आचार्य शांतिसागरजी महाराज एक ऐसे प्रमुख साधु श्रेष्ठ तपस्वी रत्न हुए हैं। जिनकी अगाध विद्वता, कठोर तपश्चर्या, प्रगाढ़ धर्म श्रद्धा, आदर्श चरित्र और अनुपम त्याग ने धर्म की यथार्थ ज्योति प्रज्वलित की। आपने लुप्तप्राय, शिथिलाचारग्रस्त मुनि परंपरा का पुनरुद्धार कर उसे जीवंत किया। यह निग्रन्थ श्रमण परंपरा आपकी ही कृपा से अनवरत रूप से आज तक प्रवाहमान है।
जन्मः- दक्षिण भारत के प्रसिद्ध नगर बेलगांव जिला चिकोड़ी तालुका (तहसील) में भोजग्राम है। भोजग्राम के समीप लगभग चार मील की दूरी पर विद्यमान येलगुल गांव में नाना के घर आषाढ़ कृष्ण 6 विक्रम संवत् 1929 सन् 1872 बुधवार की रात्रि में शुभ लक्षणों से युक्त बालक सातगौड़ा का जन्म हुआ था। गौड़ा शब्द भूमिपति-पाटिल का द्योतक है। पिता भीम गौड़ा और माता सत्यवती के आप तीसरे पुत्र थे। इसी से मानो प्रकृति ने आपको रत्नत्रय और तृतीय रत्न सम्यक चारित्र का अनुपम आराधक बनाया।
बचपनः- सातगौड़ा बचपन से ही वैरागी थे। बच्चों के समान गंदे खेलों में उनकी कोई रुचि नहीं थी। वे व्यर्थ की बात नहीं करते थे। पूछने पर संक्षेप में उत्तर देते थे। लौकिक आमोद-प्रमोद से सदा दूर रहते थे, धार्मिक उत्सवों में जाते थे। बाल्यकाल से ही वे शांति के सागर थे। छोटी सी उम्र में ही आपके दीक्षा लेने के परिणाम थे परंतु माता-पिता ने आग्रह किया कि बेटा, जब तक हमारा जीवन है तब तक तुम दीक्षा न लेकर घर में धर्म साधना करो। इसलिए आप घर में रहे।
व्यवसायः – मुनियों के प्रति उनकी अटूट भक्ति थी। वे अपने कंधे पर बैठाकर मुनिराज को दूध गंगा तथा वेद गंगा नदियों के संगम के पार ले जाते थे। वे कपड़े की दुकान पर बैठते थे, तो ग्राहक आने पर उसी से कहते थे कि-कपड़ा लेना है तो मन से चुन लो, अपने हाथ से नापकर फाड़ लो और बही में लिख दी। इस प्रकार उनकी निःस्पृहता थी। आप कभी भी अपने खेतों में पक्षियों को नहीं भगाते थे। बल्कि खेतों के पास पीने का पानी रखकर स्वयं पीठ करके बैठ जाते थे। फिर भी आपके खेतों में सबसे अधिक धान्य होता था। वे कुटुंब के झंझटों में नहीं पड़ते थे। उन्होंने माता-पिता की खूब सेवा की और उनका समाधिमरण कराया।
संयम पथः- माता-पिता के स्वर्गस्थ होते ही आप गृह विरत हो गए एवं मुनिश्री देवप्पा स्वामी से 41 वर्ष की आयु में कर्नाटक के उत्तर ग्राम में ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी सन् 1915 को क्षुल्लक के व्रत अंगीकार किए। आपका नाम शांतिसागर रखा गया। क्षुल्लक अवस्था में आपको कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था क्योंकि, तब मुनिचर्या शिथिलताओं से परिपूर्ण थी। साधु आहार के लिए उपाध्याय द्वारा पूर्व निश्चित गृह में जाते थे। मार्ग में एक चादर लपेटकर जाते थे। आहार के समय उस वस्त्र को अलग कर देते थे। आहार के समय घंटा बजता रहता था जिससे कोई विध्न न आए। महाराज ने इस प्रक्रिया को नहीं अपनाया और आगम की आज्ञानुसार चर्या पर निकलना प्रारंभ किया। गृहस्थों को पड़गाहन की विधि ज्ञात न होने से वे वापस मंदिर में आकर विराज जाते। इस प्रकार निराहार 4 दिन व्यतीत होने पर ग्राम में तहलका मच गया तथा ग्राम के प्रमुख पाटील ने कठोर शब्दों में उपाध्याय को कहा-शास्त्रोक्त विधि क्यों नहीं बताते? क्या साधु को निराहार भूखा मार दोगे। तब उपाध्याय ने आगमोक्त विधि बतलाई एवं पड़गाहन हुआ।
ऐलक दीक्षाः- नेमिनाथ भगवान के निर्माण स्थान गिरनार जी की वंदना के बाद इसकी स्थायी स्मृति रूप में अपने ऐलक दीक्षा ग्रहण की। ऐलक रूप में आपने नसलापुर में चतुर्मास किया। वहां से चलकर ऐनापुर ग्राम में रहे।
मुनि दीक्षाः- उस समय यरनाल में पंचकल्याणक महोत्सव (सन् 1920) होने वाला था। वहां जिनेंद्र भगवान के दीक्षा कल्याणक दिवस पर उन्होंने अपने गुरुदेव देवेंद्रकीर्ति जी से फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी 24 मार्च मुनिदीक्षा ग्रहण की।
आचार्य पदः- समडोली में नेमिसागर जी की ऐलक दीक्षा और वीरसागर जी की मुनि दीक्षा के अवसर पर समस्त संघ ने महाराज को आचार्य पद (सन् 1924) से अलंकृत कर अपने आप को कृतार्थ किया।
चारित्र चक्रवर्तीः- गजपंथा में चतुर्मास के बाद सन् (1934) पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस अवसर पर उपस्थित धार्मिक संघ ने महाराज को चारित्र चक्रवर्ती पद से अलंकृत किया।
सल्लेखनाः- जीवन पर्यंत मुनिचर्या का निर्दाेष पालन करते हुए 84 वर्ष की आयु में दृष्टि मंद होने के कारण सल्लेखना की भावना से आचार्य श्री सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी जी पहुंचे। वहां पर उन्होंने 13 जून को धर्मसभा के मध्य आपने सल्लेखना धारण करने के विचारों को अभिव्यक्त किया। 15 अगस्त को महाराज ने आठ दिन की नियम-सल्लेखना का व्रत लिया जिसमें केवल पानी लेने की छूट रखी। 17 अगस्त को उन्होंने यम सल्लेखना या समाधिमरण की घोषणा की तथा 24 अगस्त को अपना आचार्य पद अपने प्रमुख शिष्य श्री 108 वीरसागर जी महाराज को प्रदान कर घोषणा पत्र लिखवाकर जयपुर (जहां मुनिराज विराजमान थे) पहुंचाया। आचार्य श्री ने 36 दिन की सल्लेखना में केवल 12 दिन जल ग्रहण किया। 18 सितंबर 1955 को प्रातः 6.50 पर ॐ सिद्धोऽहं का ध्यान करते हुए आचार्यं श्री शांतिसागर जी ने नश्वर देह का त्याग कर दिया। संयम-पथ पर कदम रखते ही आपके जीवन में अनेक उपसर्ग आए। जिन्हें समता पूर्वक सहन करते हुए आपने शांतिसागर नाम को सार्थक किया।
कुछ उपसर्गों एवं परीषहों की संक्षिप्त झलकियां
सर्प का उपसर्गः- क्षुल्लक दशा मे कोगनोली के मंदिर में ध्यानस्थ शांतिसागर जी के शरीर से विशाल विषधर लिपट गया। बहुत देर तक क्रीड़ा करने के बाद शांत भाव से वापस चला गया। मध्यान्ह का समय था कोन्नूर की गुफा में महाराज सामायिक कर रहे थे। एक उड़ने वाला सर्प आया और महाराज की जंघाओं के बीच छिप गया। वह लगभग तीन घंटे तक उपद्रव करता रहा। लेकिन, आचार्य श्री ने अपनी स्थिर मुद्रा को भंग नहीं किया।
शेर का उपसर्गः- द्रोणगिरी के पर्वत पर रात्रि में महाराज जब ध्यान करने बैठे तभी एक सिंह आ गया। वह प्रातः लगभग 8-9 बजे तक महाराज के सामने ही बैठा रहा। इस प्रकार मुक्तागिरी पर्वत पर भी जब महाराज ध्यान में रहते थे। शेर झरने पर पानी पीने आ जाता था। आचार्यश्री का कहना था कि भय किस बात का? यदि वह पूर्व का बैरी न हो और हमारी ओर से कोई बाधा या आक्रमण न हो तो वह क्यों आक्रमण करेगा? बिना किसी भय के आत्मलीन रहते थे। कोन्नूर के जंगल में महाराज धूप में बैठकर सामायिक कर रहे थे, इतने में एक बड़ा सा कीड़ा उनके पास आया और उनके पुरुष चिन्ह से चिपट कर वहां का रक्त-चूसने लगता है। खून बहने लगा किंतु महाराज डेढ़ घंटे तक अविचल ध्यान में बैठे रहे। ऐसे ही जंगल के मंदिर में ध्यान करते वक्त असंख्य चीटियां उनके शरीर पर चढ़ गई एवं देह के कोमल अंग-उपांग को एक-दो घंटे ही नहीं सारी रात खाती रहीं, तब वे महापुरुष साम्य भाव से परीषह सहन करते रहे। एक अविवेकी श्रावक जो कपड़े से गर्म दूध का बर्तन पकड़े हुए था। उसने वह उबलता दूध महाराज की अंजुलि में डाल दिया। उष्णता की असह्य पीड़ा से महाराज की अंजुलि छूट गई और वे नीचे बैठ गए, किंतु उनकी मुख मुद्रा पर क्रोध की एक रेखा तक नहीं उभरी। श्रावक की अज्ञानता के कारण नौ दिन तक पर्याप्त जल नहीं मिला। जिसके कारण उनकी छाती पर फफोले पड़ गए पर वे गंभीर और शांत बने रहे। दसवें दिन मात्र जल लेकर ही बैठ गए। दस-बारह वर्ष तक महाराज दूध और चावल ही मात्र लेते रहे। एक दिन किसी श्रावक ने पूछा-महाराज आप और कुछ आहार में क्यों नहीं लेते, तब महाराज बोले-जो आप देते हैं वही मैं लेता हूं। दूसरे दिन श्रावकों ने दाल रोटी आदि सामग्री देनी चाही तो भी महाराज ने नहीं ली। पुनः पूछने पर बताया कि आटा, मसाला कब पिसा हुआ था? रात्रि में पिसा हुआ अन्न रात्रि भोजन के दोष का कारण बनता है। अतः पुनः मर्यादित भोजन प्राप्त होने पर ग्रहण करने लगे। आचार्य श्री ने गृहस्थ अवस्था में ही 38 वर्ष की आयु में घी-तेल का आजीवन त्याग कर दिया था। उनके नमक, शक्कर, छाछ आदि का भी त्याग था।
उन्होंने 35 वर्ष के मुनि जीवन में 27 वर्ष 3 माह 23 दिन (9938) तक उपवास धारण किए।
व्रत-उपवासः-
दिन कितनी बार। योग
16 3 बार 48
10 1 10
9 6 54
8 7 56
7 6 42
6 6 36
5 6 30
4 6 24
अंतिम 36 1 36
चरित्र शुद्धि। 1234
तीस चौबीसी। 720
कर्म दहन 3 बार। 468
सिंह निष्क्रीडित 3 बार। 270
सोलहकारण 16 बार 256
श्रुत पंचमी। 36
विधमान 20 20
दशलक्षण। 1 बार 10
सिद्ध प्रभु के 8
अष्टान्हिका। 8
गणधर व्रत 1452 केवल 200
अतिरिक्त व्रत 6372 कुल 9938
अन्नाहार का त्याग
बम्बई सरकार ने हरिजनों के उद्धार के लिए एक हरिजन मंदिर प्रवेश कानून सन् 1947 में बनाया। जिसके बल पर हरिजनों को जबरदस्ती जैन मंदिरों में प्रवेश कराया जाने लगा। जब आचार्य श्री को यह समाचार ज्ञात हुआ तो उन्होंने इसे जैन संस्कृति, जैन धर्म पर आया उपसर्ग जानकर, जब तक यह उपसर्ग दूर नहीं होगा तब तक के लिए अन्नाहार का त्याग कर दिया। आचार्य श्री की श्रद्धा एवं त्याग के परिणाम स्वरूप लगभग तीन वर्ष बाद इस कानून को हटा दिया गया। तभी आचार्य श्री ने 1105 दिन के बाद 16 अगस्त 1951 रक्षाबन्धन के दिन अन्नाहार को ग्रहण किया।
दिल्ली में दिगंबर मुनियों के उन्मुक्त विहार की सरकारी आज्ञा नहीं थी। अतः 10-20 आदमी हमेशा महाराज के विहार के वक्त साथ ही रहते थे। आचार्य महाराज को चतुर्मास के दो माह व्यतीत होने पर जब यह बात ज्ञात हुई तो महाराज ने स्वयं एक फोटोग्राफर को बुलवाया और ज्ञात समय के पूर्व अकेले ही शहर में निकल गए तथा जामा मस्जिद, लाल किला, इंडिया गेट, संसद भवन आदि प्रमुख स्थानों पर खड़े होकर उन्होंने अपना फोटो खिचवाया। समाज में अपवाद होने लगा कि महाराज को फोटो खिचवाने का शौक है। इस विषय में महाराज से पूछे जाने पर उन्होंने ने कहा-हमारे शरीर की स्थिति तो जीर्ण अधजले काठ के समान है। इसके चित्र की हमें क्या आवश्यकता और वह चित्र हम कहां रखेंगे। श्रावकों का कर्तव्य है कि इन चित्रों को सम्हाल कर रखें। जिससे भविष्य में मुनि विहार की स्वतंत्रता का प्रमाण सिद्ध हो सके। हमारे इस उद्योग से सभी दिगंबर जैन मुनियों में साहस आएगा, दिगंबर जैनधर्म की प्रभावना होगी। हमारे ऊपर उपसर्ग भी आए तो हमें कोई चिंता नहीं। अच्छे कार्य करते हुए भी यदि अपवाद आये तो उसे सहना मुनि धर्म है न कि उसका प्रतिवाद करना।
आगम ग्रंथों की सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए आचार्य श्री के आशीर्वाद एवं प्रेरणा से सिद्धांत ग्रंथों को ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण कराया गया। अनेकों भव्य आत्माओं ने आचार्यश्री से व्रत-संयम ग्रहण कर अपने जीवन का उद्धार किया।
दीक्षित शिष्य
1 मुनि 26
2 आर्यिका 4
3 ऐलक 16
4 क्षुल्लक 28
5 क्षुल्लिका 14
योग 88
गुरुणा गुरुः- श्री सात गोड़ा जी ने सन 1915 में मुनि श्री देवेंद्र कीर्ति जी से क्षुल्लक दीक्षा तथा वर्ष 1920 में मुनि दीक्षा ली थी। आप सन 1924 में आपका चतुविद संघ होने से आपको आचार्य बनाया गया। आपकी आगम अनुरूप चर्या देख कर दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी ने आपसे पुनः मुनि दीक्षा ली इस कारण आपको गुरुणा गुरु कहा जाता है। वर्ष 1925 में आप श्री श्रवण बेलगोला महामस्तकाभिषेक में भी शामिल हुए थे।













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