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सेवा, समर्पण के पर्याय: बाबूजी श्रद्धेय श्री निर्मल कुमार जी सेठी – ब्र. डॉ सविता जैन

रतलाम । 27अप्रैल2021 को रात्रि में अकस्मात फोन की घंटी बजी और श्री निर्मल कुमार जी सेठी के देहावसान का हतप्रभ करने वाला समाचार प्राप्त हुआ।
असमय का यह समाचार समस्त जैन समाज को स्तब्ध करने वाला था।-श्री निर्मल कुमार जी सेठी कोई साधारण नाम न होकर, एक ऐसा बहुआयामी असाधारण व्यक्तित्व था जिसके किस गुण को प्रमुखता देकर बात प्रारम्भ की जाए बड़ा दुविधापूर्ण हैं।
उनके व्यक्तित्व का परिचय इस बात से मिल जाता है कि उनके लिये तीन दिन तक श्रद्द्धाजलि सभा आयोजित की गई जिसमें सौ से अधिक त्यागी व्रतियों ने अपने विचार व्यक्त किये।
देव शास्त्र गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा अखिल भारतीय श्री दिगम्बर जैन महासभा के प्रति उनका समर्पण ,समाज के प्रत्येक वर्ग के उत्थान, धर्म के विविध आयामो को संगठित प्रेरित करके के कार्य आदरणीय सेठी जी को साधारण से असाधारण बनाते हैं।
उनकी सहजता, सरलता, संवेदनशीलता व गिरते सामाजिक मूल्यों के प्रति उनकी गहन चिंता तो सबको विदित ही थी।
मुझे स्मरण है कि वर्ष 1983 में राणापुर(म.प्र.)में गुरुदेव आचार्य श्री योगीन्द्रसागर जी के चातुर्मास में महासभा के विशाल अधिवेशन आयोजित किया गया था। गुरुदेव की प्रखरता एवं निर्भीक प्रवचन शैली आर्षमार्ग के पोषक होने से सेठीजी बहुत ही अभिभूत हुए। उन्होंने समाज मे व्याप्त अनेक विसंगतियों पर विचार विमर्श किया परिणामस्वरूप अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महासभा के कई ऐतिहासिक अधिवेशन अनेक शहरों में श्रृंखला बद्ध आयोजित कर समाज को नई दिशा व नई सोच से परिपूर्ण चिंतन देते रहे।दरअसल वे पीढ़ियों की दूरी को मिटाने का, पुरातन और नवीन को जोड़ने का मध्यम मार्ग अपनाकर युवा वर्ग की धर्मनिष्ठा की प्रतिष्ठा के लिए जमीन बनाने का महत कार्य कर रहे थे, उसे कार्यरूपंतारित कर रहे थे।
सेठीजी के साथ कई अधिवेशनों में सम्मिलित होने का अवसर मुझे मिला। प्राचीन तीर्थो के कार्यों में तीर्थ निरीक्षण एवम अधिवेशनों में मैं , कु. चानी टोंग्या व श्री अजितजी टोंग्या बड़नगर(म.प्र.)आदि कई लोगो ने सेठीजी के साथ कई स्थलों की यात्राएं की तब सेठीजी के महान व्यक्तित्व की सरलता,कर्मठता, तीर्थों के प्रति उनकी गहन चिन्ता को अनुभव किया।
युगपुरुष अवतार लिया करते हैं मगर युग की समझाइश और आने वाले समय की पदचाप को सुन पाना और उसके हिसाब से समाज को आगे ले जाने का गुरूतर कार्य करने वाले बिरले हुआ करते हैं।श्रद्धेय बाबूजी व्यक्ति नहीं संस्था थे, जिसने कई व्यक्तित्व गढ़े और उनको पहचान दिलाई।बाबूजी श्री निर्मल कुमार जी सेठी ने महासभा के अध्यक्ष पद को लगभग 40 वर्षों तक सुशोभित किया।
प्रथम बार अध्यक्ष बनते ही उन्होंने पारिवारिक व निजी हितों से अधिक संस्था व धर्म के कार्यों को प्राथमिकता देनी प्रारंभ कर दी थी।सेठीजी ने दूरदर्शिता के साथ ही व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए महासभा के साथ-साथ समाज को मज़बूत करने हेतु धर्म के समस्त प्रतीकों को जीवंत रखने पर बल दिया।
जैन धर्म एकांतवादी नही वरन अनेकान्तवादी है। अतएव धर्म के संपूर्ण अस्तित्व को प्रत्येक पक्ष को मजबूत करना होगा।इसलिये उन्होंने महासभा की विभिन्न शाखाओं को विकसित किया-

1.श्री दिगम्बर जैन महासभा(धर्म संरक्षणी)
2. श्री दिगम्बर जैन महासभा( तीर्थ संरक्षिणी)
3. श्री दिगम्बर जैन महिला महासभा
4. श्री दिगम्बर जैन युवा महासभा
5. जैन राजनीतिक मंच आदि

साथ ही जैन गजट के माध्यम से समस्त सूचनाओं का प्रसारण, जैन पुरातत्व हेतु प्राचीन तीर्थ जीर्णोद्वार पत्रिका का प्रकाशन ,आगम के शोधकर्ताओं हेतु श्रुतसंवर्धनी पत्रिका का प्रकाशन को नियमित रूप देकर समाज के विभिन्न कुशल शिल्पकारों को एक मंच से जोड़कर समस्त गतिविधियों का संचालन, सेठी जी के कुशल प्रबन्धन का सुपरिणाम है।
उन्होंने अधिकारो के विकेंद्रीकरण में विश्वास रख , नए व्यक्तियो को प्रोत्साहित किया और आगे लाते रहे औऱ प्रत्येक सफलता का श्रेय अपने साथीयों को देते थे। यह उनका बडप्पन था। अन्त में यही कहूंगी की आदरणीय सेठी जी समाज के व्यक्ति नही अपितु सम्पूर्ण संस्था थे। समाज मे ऐसे व्यक्तित्व बिरले होते है।
सेठीजी के लिए शायर की ये पंक्तियाँ पूर्ण रूप से चरितार्थ होती है कि –

मैं अकेला ही चला था,
ज़ानिब ऐ मंजिल मगर ।
लोग मिलते गए ,
कारवा बनता गया।।

परम श्रध्देय बाबूजी श्री निर्मलकुमारजी सेठी को वंदन, नमन, श्रद्धा सुमन, श्रद्धांजलि

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