आज उत्तम संयम धर्म का दिन है। संयम का मतलब केवल अनुशासन नहीं आत्मानुशासन है। संयम धर्म, चार कषाय के अभाव में हमारे भीतर जो सत्य आया है उसको सुरक्षा प्रदान करता है। संयम धर्म ऊपर के सब धर्मो से हटके है, यह लाइफ को मैनेज करने का एक उपकरण है। आर्थिक संपन्नता हर व्यक्ति चाहता है उसके लिए ही जीवन की ये आपा-धापी है। यह बात मुनि श्री विनम्र सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कही। पढ़िए सतीश जैन की यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। आज उत्तम संयम धर्म का दिन है। संयम का मतलब केवल अनुशासन नहीं आत्मानुशासन है। संयम धर्म, चार कषाय के अभाव में हमारे भीतर जो सत्य आया है उसको सुरक्षा प्रदान करता है। संयम धर्म ऊपर के सब धर्मो से हटके है, यह लाइफ को मैनेज करने का एक उपकरण है। आर्थिक संपन्नता हर व्यक्ति चाहता है उसके लिए ही जीवन की ये आपा-धापी है। यह बात मुनि श्री विनम्र सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि संयम दो तरह के होते हैं
पहला है – प्राणी संयम
प्राणियों की रक्षा करना प्राणी संयम है।
दूसरा है- इंद्रिय संयम.
स्पर्शन, रसना, ध्राण, चक्षु और कर्ण इंद्रियों पर नियंत्रण रखना इंद्रिय संयम है।
उन्होंने कहा कि संयम धर्म आपको मंदिर आने पूजा करने के लिए नहीं बोलता। उदाहरण देते हुए आपने बताया कि एक बहुत बड़े सेठ ने अपने लड़के को दैनिक उपयोग की चीजों की बड़ी दुकान खुलवा दी, दुकान में सब कुछ है, किंतु दुकान चलती नहीं है। आपने जिस लड़के को मालिक बनाकर बैठाया उसकी नजर ठीक नहीं है । दृष्टि का संयम नहीं रहेगा तो दुकान नहीं चलेंगी। जिसका लोक व्यवहार अच्छा होगा वही तरक्की कर पाएगा। आपकी वाणी भी संयमित होना चाहिए। मुनिवर कहते हैं, कि जितने भी जेल खाने कैदियों से भरे पड़े हैं वो केवल पांच पापों के कारण ही भरे पड़े हैं। असंयमी व्यक्ति संयम को बहुत अच्छे से समझता है, लेकिन उस पर अमल नहीं करता। अपने बोलने और सुनने का भी एक लेवल होना चाहिए , कोई लो लेवल पर उतरकर बात करें तो उससे बात मत करिएगा, मौन हो जाइएगा। पर्युषण पर्व सार्वभौमिक रूप से मनाया होता तो आज सारी जेलें खाली होती। इस पर्व को मनाने की प्रेरणा भी पूर्व आचार्यों ने दी, इसलिए आप भादो के 10 दिन मंदिर में जाकर धर्म लाभ ले रहे हो। संयम की बात जेलों में होना चाहिए। आप उत्तम संयम धर्म मत देखिए वो तो साधुओं के लिए है आप केवल संयम धर्म ही देखिए। कर्ण इंद्री का संयम रखना होगा। चार शब्दों में अंदर का राक्षस बाहर निकल कर आ जाता है। आप व्यवहार अच्छा रखकर बहुत अच्छा पैसा कमा सकते हो। बड़े-बड़े आदमी कितना मीठा बोलते हैं। यदि मान का संयम भी शामिल हो गया तो आप साधु जैसे हो जाएंगे। आज के दिन केवल इतना सीख लो कि हमारे कारण किसी को दुख ना हो। उत्तम संयम का पालन करेंगे तो एक दिन सिद्धालय में भी जा सकते हो।उक्त उदगार छत्रपति नगर के दलाल बाग में मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज ने व्यक्त किए।
ये कार्यक्रम भी हुए
इस पहले प्रदीप धनोते ने आज एक प्रतिमा विराजित करने की राशि प्रदान की। आनंद कुमार जैन, रवि जैन इंदौर और प्रवीण नागर ने भी एक बड़ी राशि दान की। दोपहर में दलाल बाग के पंडाल में आचार्य श्री जी की एक मनमोहक झांकी भी लगी। प्रातः गुरुदेव के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन के बाद गुरुदेव की आठ द्रव्यों से सभी शिविरार्थियों ने पूजन की। आज प्रातः 5:00 बजे से ही मांगलिक क्रियाएं प्रारंभ हो गई थीं। दोपहर 3 बजे से तत्वार्थ – सूत्र का वाचन हुआ। रात्रि 7:00 बजे से संगीतमय आरती हुई। इस अवसर पर सचिन जैन, राकेश सिंघई, मनीष नायक, सतीश डबडेरा, सतीश जैन, आनंद जैन , अमित जैन, शिरीष अजमेरा, आलोक बंडा के साथ ही बहुत अधिक संख्या में समाजजन मौजूद थे।पूज्य मुनि श्री निस्वार्थ सागरजी महाराज ने भी आशीर्वचन दिए। मुनिश्री निसर्ग सागर जी एवं क्षुल्लक श्री हीरक सागर जी भी मंच पर विराजित थे। आचार्य श्री जी की पूजन के पश्चात , 9:00 बजे से मुनि श्री जी के प्रवचन हुए। धर्म सभा का संचालन ब्रह्मचारी मनोज भैया ने किया।













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