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गणाचार्य श्री विराग सागर जी गुरुदेव से ली थी दीक्षा : श्रेयांसगिरि में आर्यिका विचारश्री माताजी का हुआ संल्लेखना समाधि महोत्सव


बीते 21 जुलाई को देवेंद्रनगर निवासी ब्रह्मचारिणी कुसुम जी की आर्यिका दीक्षा सुबह 10:00 बजे संपन्न हुई एवं दोपहर 1:45 पर समाधि मरण हो गया। इसके बाद शाम 5:30 पर गाजे-बाजे के साथ धूमधाम भक्ति भाव जयकारों के साथ अंतिम दर्शन पश्चात समाधि महोत्सव हजारों जैन-जैनेत्तर धर्मावलंबियों की उपस्थिति में संपन्न हुआ। पढ़िए राजेश रागी/ भरत सेठ की रिपोर्ट…


पन्ना। जिले सलेहा के समीपवर्ती अतिप्राचीन दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र श्रेयांसगिरि पर चातुर्मासरत राष्ट्रसंत, भारत गौरव गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज विशाल संघ सहित विराजमान है। मीडिया समिति के भरत सेठ ने बताया कि पिछले सप्ताह सागर निवासी ब्रह्मचारिणी क्रांति जी की दीक्षा उपरांत समाधि महोत्सव संपन्न हुआ।

बीते 21 जुलाई को देवेंद्रनगर निवासी ब्रह्मचारिणी कुसुम जी की आर्यिका दीक्षा सुबह 10:00 बजे संपन्न हुई एवं दोपहर 1:45 पर समाधि मरण हो गया। इसके बाद शाम 5:30 पर गाजे-बाजे के साथ धूमधाम भक्ति भाव जयकारों के साथ अंतिम दर्शन पश्चात समाधि महोत्सव हजारों जैन-जैनेत्तर धर्मावलंबियों की उपस्थिति में संपन्न हुआ।

जीवन भर शुद्ध आचार विचार का ध्यान

यूं तो संसार में प्रतिक्षण अनेकों प्राणियों का जन्म मरण होता रहता है लेकिन उस मरण को समाधि मरण महोत्सव बनाने वाले विरले ही पुण्यवान होते हैं। अनेक संतों ने अपने साधनामय जीवन को समाधि मरण करके सफल किया है। जीवन भर किए गए अन्य कार्यों की सफलता तभी मानी जाती है, जब अंत समय व्रत संयम का पालन करते हुए गुरु चरणों में भगवान के नाम स्मरण के साथ समाधि मरण करने का अवसर प्राप्त हो। ऐसी ही थीं कुसुम बाई, जिनका जन्म पन्ना में हुआ तथा देवेंद्रनगर की निवासी थीं। आपकी उम्र 87 वर्ष की थी। आप अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। आपके पति स्वर्गीय श्री राजकुमार जी थे। आप के 2 पुत्र जिनेंद्र, सुशील एवं दो पुत्रियां उषा, रानी हैं। आपने बचपन से ही आलू प्याज आदि का स्पर्श भी नहीं किया।

इसके साथ ही बच्चों की शादी के बाद कभी किसी को रात्रि भोजन तक नहीं दिया। आपका सदैव प्रातः 11:00 बजे तक अन्य जल का त्याग रहता था। साधु-संतों के आहार उपरांत ही भोजन किया करती थीं तथा नगर में साधु-संतों के आ जाने पर बड़ी श्रद्धा भक्ति के साथ चौका लगाने व आहार देने में अत्यधिक रुचि रहती थी। लगभग 50 वर्षों से आप शुद्ध भोजन पानी तथा 2 वर्ष से एकासन के नियम में दृढ़ थीं। इसके साथ ही अष्टमी, चतुर्दशी एकासन अनंत चौदस आजीवन मौन पूर्वक उपवास तथा अपने जीवन काल में 1500 उपवास और 3000 एकासन की साधना में संलग्न थीं, लगभग 15 दिनों से आपने पूज्य गुरुदेव गणाचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज के चरणों में दीक्षा लेने की पवित्र भावना की थी।

आपको 18 जुलाई मंगलवार को पूज्य गणाचार्य श्री विराग सागर जी गुरुदेव द्वारा सप्तम प्रतिमा के व्रत दिए गए, 21 जुलाई प्रातः काल 9:45 पर क्षुल्लिका दीक्षा एवं 11:30 पर आर्यिका दीक्षा के व्रत प्रदान किए गए और आपका नाम रखा गया श्रमणी आयिका विचार श्री माताजी क्योंकि उन्होंने जीवन भर शुद्ध आचार विचार का ध्यान रखा है।

अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि तीर्थ पर परम पूज्य गणाचार्य गुरुदेव के कुशल नेतृत्व मे मंत्रोच्चारण के साथ सिद्ध परमात्मा का स्मरण करते हुए चतुर्विद संघ के समक्ष चारों प्रकार के आहार का त्याग पूर्वक यम संल्लेखना सहित 1:45 पर अंतिम स्वास छोड़ी और अपनी मृत्यु को समाधि महोत्सव बना लिया. बड़ी क्षमता के साथ माताजी ने नश्वर देह का विसर्जन कर स्वर्ग की ओर प्रयाण किया। समाधि की खबर लगते ही अंतिम दर्शन के लिए हजारों की संख्या में जैन जैनेत्तर धर्मावलंबियों का तांता लगा रहा, वहीं मृत्यु महोत्सव में सम्मिलित होकर धर्म लाभ प्राप्त किया।

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