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अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में हुई संल्लेखना : आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की हुआ समाधिमरण


सलेहा के समीपवर्ती बुंदेलखंड के सुविख्यात प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में परम पूज्य भारत गौरव, राष्ट्रसंत, गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज ससंघ (30 साधु) के पावन सानिध्य में आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की संल्लेखना समाधि हुई। पढ़िये राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…


श्रेयांसगिरि (पन्ना)। सलेहा के समीपवर्ती बुंदेलखंड के सुविख्यात प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्रेयांसगिरि में परम पूज्य भारत गौरव, राष्ट्रसंत, गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज ससंघ (30 साधु) के पावन सानिध्य में आर्यिका विमोहिताश्री माताजी की संल्लेखना समाधि हुई। ज्ञातव्य है कि सागर निवासी ब्रह्मचारिणी क्रांति जैन का स्वास्थ्य विगत ढाई महिने से खराब चल रहा था।

अर्पित किया था श्रीफल

भरत सेठ ने बताया कि बीते 9 जुलाई को ब्र. क्रांति जैन ने अपने परिवार के साथ संल्लेखना समाधि हेतु पूज्य गणाचार्यश्री से निवेदन कर श्रीफल अर्पित किया था। पूज्य गणाचार्यश्री ने स्थिति गंभीर देखते हुए ब्र. क्रांति जी को 10 जुलाई को क्षुल्लिका दीक्षा देकर विमोहिताश्री माताजी का नामकरण किया था। 14 जुलाई को समस्त समाज के मध्य उनकी आर्यिका दीक्षा संपन्न हुई थी। पूज्य गणाचार्यश्री अपने संघ के साथ माताजी की सेवा संबोधन, वैयावृत्ति मे संलग्न थे। साथ ही श्रेयांसगिरि अंचल का जैन समाज माताजी को पाठ आदि सुनाने में तत्पर था।

माताजी की अद्भुत त्याग तपस्या

पारिवारिक जनों ने बताया कि माताजी ने अपना पूरा जीवन संयम साधना में बिताया। उन्होंने लगभग 4000 एकासन उपवास अपने किए तथा भगवान की भक्ति में सतत तत्पर रहकर लगभग 20 हजार श्रीफल द्वारा प्रभु की महाअर्चना कर चुकी हैं।

गुरु के लिए समर्पित संपूर्ण जीवन

माताजी ने गृहस्थ में रहकर 21 वर्ष पूर्व पूज्य गणाचार्यश्री से सागर में 2 प्रतिमा के व्रत ग्रहण किए तथा 2 माह पूर्व बड़ा मलहरा में सात प्रतिमा के व्रत ग्रहण कर पूज्य गुरुवर के चरणों में समाधि करने की भावना व्यक्त की, तदनुसार श्रेयांसगिरि मे आकर आपने गुरु चरणों में घर का त्याग कर आचार्य संघ में प्रवेश लिया। 10 जुलाई को दीक्षा लेकर माताजी ने केवल 3 दिन आहार ग्रहण किया, जिसमें मात्र जल, दूध ही आहार में लिया लेकिन ऐसी अवस्था में भी इतनी सहजता देख स्वयं पूज्य गणाचार्यश्री ने कहा था कि विमोहिता श्री माताजी समता की प्रतिमूर्ति हैं।

अन्न जल का आजीवन किया त्याग

14 जुलाई को माताजी ने स्वेच्छा से गुरुचरण सानिध्य में अन्न जल का त्याग किया, तब से वह प्रभु भक्ति एवं आत्म ध्यान में तल्लीन होकर समाधि साधना में रत थी। समाधि होने की सूचना मिलते ही दूर-दूर से बड़ी संख्या में दर्शनार्थियों का आवागमन जारी है।

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