दसलक्षण पर्व के छठे दिन आचार्य वर्धमान सागर जी ने कहा कि आत्मा की उन्नति और तीर्थंकर पद की प्राप्ति के लिए संयम रूपी ऊर्जा शक्ति अत्यंत आवश्यक है। संयम जीवन का ब्रेक है जो इंद्रियों और कषायों पर नियंत्रण कर आत्मा को ऊंचाई प्रदान करता है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने दसलक्षण पर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म की विवेचना करते हुए कहा कि आत्मा की उन्नति और ऊंचाई के लिए संयम रूपी ऊर्जा शक्ति आवश्यक है। तीर्थंकर पद भी बिना संयम धारण किए नहीं मिलता।
उन्होंने समझाया कि साधु संयम के माध्यम से व्रत, समिति, गुप्ती और महाव्रतों का पालन कर कषायों का निग्रह करते हैं और इंद्रियों पर विजय प्राप्त करते हैं। जैसे नदी के तट टूटने पर विनाश होता है, वैसे ही जीवन में संयम न होने पर कष्ट और विपदाएं आती हैं।
आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे पानी को बांध कर ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसी प्रकार संयम आत्मा की ऊर्जा है जो जीवन को उन्नति पर ले जाती है। जीवन रूपी बेल भी दीवार या रस्सी के सहारे ऊपर बढ़ती है, उसी प्रकार संयम से जीवन ऊंचाई को प्राप्त करता है।
जीवन में संयम रूपी ब्रेक हर पल आवश्यक
उन्होंने कहा कि वाहन चलाते समय जैसे ब्रेक जरूरी है, वैसे ही जीवन में संयम रूपी ब्रेक हर पल आवश्यक है। संयम से वैराग्य उत्पन्न होता है, संयम से आत्मा कर्मबंधन से मुक्त होती है और संयम ही आत्मा को ऊंचाई प्रदान करता है। इस अवसर पर श्री आदिनाथ भगवान का पंचामृत अभिषेक किया गया। आचार्य श्री ने बताया कि यह परंपरा आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के समय से है ताकि संघ के श्रावक-श्राविकाओं को पूजन में कोई असुविधा न हो। उन्होंने कहा कि अभिषेक के बिना पूजन अधूरा होता है, इसलिए समाज की प्राचीन परंपराओं को बदलना उचित नहीं।
अष्टकर्मों के दहन हेतु धूप अर्पित
समाज ने सामूहिक रूप से नगर के जिनालयों में अष्टकर्मों के दहन हेतु धूप अर्पित की। महिलाओं ने सुगंध दशमी का व्रत किया और एक-दूसरे को मंगलकामनाएं दीं। शाम को श्रीजी, मंडल विधान और आचार्य श्री की आरती के बाद सांस्कृतिक प्रश्नोत्तरी एवं धार्मिक कार्यक्रम आयोजित हुए।













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