धरियावद में पर्यूषण पर्व के छठे दिन क्षुल्लक महोदय सागर जी महाराज ने कहा कि संयम बंधन नहीं, बल्कि अभिनंदन का दिन है। संयम जीवन का ब्रेक है, जिसके बिना मनुष्य का जीवन दुर्घटना की ओर बढ़ता है। पढ़िए अशोक जेतावत की पूरी रिपोर्ट…
धरियावद। पर्यूषण पर्व के छठे दिन श्री महावीर स्वामी दिगंबर जैन मंदिर में क्षुल्लक महोदय सागर जी महाराज ससंघ सान्निध्य में जिनाभिषेक, शांतिधारा और प्रवचन सभा का आयोजन हुआ। क्षुल्लक जी ने अपने मंगल संदेश में कहा कि संयम को प्रायः बंधन समझा जाता है, जबकि वास्तव में यह अभिनंदन का दिन है। मन, वचन और इंद्रियों को वश में करना ही वास्तविक संयम धर्म है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि नदी अपने संयम रूपी तटों के बीच बहते हुए सागर में मिलकर विशालता को प्राप्त करती है, लेकिन यदि वह अपने तट तोड़ दे, तो विभिषिका बनकर स्वयं का अस्तित्व नष्ट कर देती है।
जीवन में संयम रूपी ब्रेक जरूरी
क्षुल्लक महोदय सागर जी ने कहा कि पूर्वकाल में हमारा राष्ट्र योग-संस्कृति पर आधारित था, लेकिन आज भोग-संस्कृति ने युवाओं ही नहीं, बच्चों और वृद्धों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। संयम को लोग डर की दृष्टि से देखते हैं, जबकि इसके बिना न तो देवत्व संभव है और न ही सच्चा मानव होना। उन्होंने जीवन को गाड़ी से तुलना करते हुए कहा कि संसार में हम बेखौफ दौड़ रहे हैं, जैसे बिना ब्रेक की गाड़ी। उसका परिणाम केवल दुर्घटना है। यदि जीवन में संयम रूपी ब्रेक होगा तो हम निश्चित ही एक दिन भगवान बन सकते हैं।













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