
झारखंड सरकार द्वारा सम्मेद शिखर को लेकर फैसला वापस लिए जाने संबंधी जानकारियां अचानक चलने लगी । इसकी जानकारी किसी श्रावक ने सीधे आचार्य श्री विद्यासागर जी को लिखकर दी और एक धार्मिक टीवी चैनल पर आचार्य जी के श्रीमुख से ऐसी वाणी बुलवाई गई जिसमें विरोधाभास था ।
दीपक जैन ने इस पर अपनी चिंता जताते हुए सभी श्रावकों को चेताया कि जैन साधू-संत, उन बातों की व्याख्या करते हैं जो धर्म सम्मत हो । ऐसे में हमें संतों के श्रीमुख से आज के समाज की उन्हीं बातों और तथ्यों की व्याख्या करवानी चाहिए जिनमें सत्यता हो ।
जैन साधू-संत और विशेषकर सदी के संत के रूप में पूजनीय आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के श्रीमुख से ऐसी बातें कहलवाना दुर्भाग्यपूर्ण है ।
उनका एक-एक शब्द पूजनीय है । उनके श्रीमुख से हमेशा वो ही बात आनी चाहिेए जो सत्य और भ्रमित करने वाली न हो । आचार्य निस्पृही होते हैं । सांसारिक व तात्कालिक विषयों पर उनकी धारणाएं और उनके वक्तत्व कमेटी के सदस्यों की बातों पर निर्भर करते हैं ।
ये श्रावकों की नैतिक,सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारी है कि वो सत्य और असत्य की जांच-पड़ताल करके ही संतों को जानकारी उपलब्ध करवाएं । दीपक जैन ने उन समाचार पत्रों के प्रति भी नाराजगी जताई है जिन्होनें इस तरह के शीर्षक लगाए गए हैं मानों आचार्य श्री गलत बयानी कर रहे हों ।












