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जैन पत्रकार महासंघ सम्मेलन : तीर्थक्षेत्र को बनाना होगा आत्मनिर्भर तभी विकास संभव


जहाजपुर में आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी के सानिध्य में दो दिवसीय जैन पत्रकार महासंघ सम्मेलन चल रहा है। इसमें विभिन्न प्रदेश के पत्रकार, लेखक और विद्वान तीर्थ संरक्षण पर मंथन कर रहे हैं। सम्मलेन के द्वितीय दिन श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन ने तीर्थ संरक्षण और विकास पर अपने विचार रखे। जहाजपुर से पढ़िए यह खबर…


जहाजपुर। गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी के सानिध्य में दो दिवसीय जैन पत्रकार महासंघ सम्मेलन में श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन ने तीर्थ संरक्षण और विकास पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि जैन ग्रंथों में तीर्थ का अर्थ कहा है कि जो हमें संसार समुद्र से तार दे, उसे तीर्थ कहते हैं। तीर्थ का अर्थ पवित्र या घाट भी होता है। जैन धर्म के इतिहास, संस्कार और संस्कृति को कोई बताने वाला है उसमें तीर्थ भी हैं। कौन से तीर्थंकर का कहां जन्म हुआ और कहा मोक्ष हुआ। उसी से पता चलता कि कितना पुराना हमारा धर्म है। अतिशय क्षेत्र और सिद्धक्षेत्र के ऊपर से हम तीर्थों को जानते हैं या फिर जहां पर से किसी तीर्थंकर का गर्भ, जन्म, तप, केवलज्ञान प्राप्त हुआ हो वह भी तीर्थ कहलाता है। आज तीर्थों के संरक्षण और सुरक्षा की आवश्यकता है।

जिस प्रकार हमारे तीर्थ असुरक्षित हो रहे हैं। उस पर चिंतन की आवश्यकता है कि भविष्य में इन तीर्थों का क्या होगा। धनाढ्य, पत्रकार और साधु जब तक एक साथ बैठ नहीं पाएंगे तब तक तीर्थों की सुरक्षा और संरक्षण संभव नहीं है। धनाढ्य का धन सुरक्षा के काम आएगा। विद्वान पत्रकार उसके इतिहास को सुरक्षित रखेगा और तीर्थों का महत्व जन-जन तक पहुंचाने का काम करेगा और संत तीर्थ के प्रति समाज में जागरूकता का काम करेंगे।

परिवारों को तीर्थों पर बसाना होगा

श्रीफल न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन ने अपने उद्बोधन में कहा कि किसी स्थल को सुरक्षित रखने और संचालन के लिए सबसे अधिक जरूरी है कि उस स्थान पर श्रावकों का पहुंचना और वहां रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा के साथ ही धर्म की साधना करने वालों के लिए स्थान का होना और स्थाई रूप से धन आने का साधन क्योंकि दान के पैसे से तीर्थों की सुरक्षा अब संभव नहीं। समाज में अनेक कार्य हो रहे नए तीर्थ बन रहे तो धन वहां भी जा रहा है। आज हमारे तीर्थों पर श्रावकों के घर नहीं हैं और तीर्थों पर काम करने वाले जैन परिवार नहीं हैं। सबसे पहले हमें ऐसे परिवारों को तीर्थों पर बसाने का काम करना होगा। जिन्हें रोजगार की आवश्यकता है। उसके बाद उन क्षेत्रों में लघु उद्योग स्थापित किए जाए। इन उद्योग का संचालन तीर्थक्षेत्र को संचालन करने वाली संस्थान करें। इससे दो काम होंगे, एक तो वहां पर श्रावकों की संख्या बढ़ेगी और जो उद्योग से बचत होगी। वह तीर्थ के विकास में काम आएगा। लघु उद्योग की जगह हम कोई ऐसी फैक्ट्री भी लगा सकते हैं। जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं हो। यह सब करने से धन का स्थाई आय का स्रोत होगा।

खाद्य पदार्थों की फैक्ट्री की स्थापना हो

वर्तमान में तीर्थ के संरक्षण के जिस प्रकार से धन की कमी महसूस हो रही उसको देखते हुए स्थाई आय का स्रोत शुरू करना चाहिए। आत्मनिर्भरता की ओर तीर्थों को भी बढ़ाना चाहिए और इसमे कोई गलत नहीं है। क्योंकि प्राचीन समय में मंदिरों के नाम पर जमीनें होती थी, उसकी आय से मंदिर की पूजा-पाठ और मंदिर की सेवा करने वाले का खर्च चलता था। अब समय के अनुसार तीर्थ क्षेत्रों के लिए आय का स्रोत शुरू करें, जो धर्म के अनुकूल हो। जैसे इसमें गृह उद्योग जैसे आटे, मसाले आदि खाद्य पदार्थों की फैक्ट्री की स्थापना हो आदि। तीर्थ पर आय का स्थाई स्तोत्र इसलिए जरूरी है क्योंकि, वहां पर काम करने वाले कर्मचारी की तनख्वाह, क्षेत्र का मेंटेनेंस इत्यादि का खर्च कैसे स्थाई हो, जो होना ही है।

यह प्रेरणा समाज को साधु ही दे सकता है

उन्होंने आगे कहा कि आज जैन समाज के संगठन, व्यक्ति अलग-अलग स्थान पर शिक्षा और चिकित्सा के लिए मदद कर रहे उनको अब अपना विचार बदल कर तीर्थ क्षेत्रों की ओर आगे बढ़ना होगा और वहां पर चिकित्सा और शिक्षा के लिए अपने धन का उपयोग करे इस प्रकार की प्रेरणा ओर संगठनों और व्यक्ति को देना होगा उनको तीर्थों से जोड़ना होगा। एक साथ तीर्थ संचालन कर रही संस्थाएं छोटे, बड़े का भेद न कर सभी साधुओं के पास जाकर उनका मार्गदर्शन लें और साधुओं से निवेदन करें कि वह समाज के प्रत्येक घर को तीर्थ सुरक्षा का काम कर रही संस्था से जुड़ें या तीर्थ से जुड़ें। यह प्रेरणा समाज को साधु ही दे सकता क्योंकि जैन समाज के साधु निरंतर विहार करते रहते हैं और साधुओं की बात को पत्रकार जन-जन तक पहुंचाने का काम कर सकता है।

 फिर समाज साथ हो जाएगा

प्राचीन तीर्थों पर नए मंदिर नहीं बनने देना चाहिए। इससे दो समस्या हो रही कि पुराने मंदिरों में दान कम आता है और नए निर्माण में पैसा लग रहा और प्राचीनता नष्ट हो रही है। इसके लिए समाज और साधु और संस्थाओं को तीर्थ सुरक्षा की दृष्टि रखकर काम करना होगा और तभी संभव है, अगर सब अपने पद, अहंकार, संतवाद और पंथवाद को लेकर बैठ जाएंगे तो तीर्थों का संरक्षण संभव नहीं है। इस सबके लिए समाज को विश्वास में लेना होगा। उसके लिए पहले एक तीर्थ को चयनित करें और उसे विकसित करें जब समाज उस तीर्थ को देखेगा तो समाज को विश्वास होगा कि तीर्थ का विकास हुआ है तो फिर समाज तीर्थ के काम कर रही संस्था के साथ हो जाएगा।

पुण्य अर्जन के लिए तीर्थों की आवश्यकता है

रेखा जैन ने आगे कहा कि तभी हम श्रावक होने का कर्तव्य सही अर्थों में पूरा कर सकेंगे। इस कार्य पर जल्द से जल्द विचार कर कार्य शुरू करना चाहिए क्योंकि, आज हमारी पहचान इन्हीं तीर्थों के कारण है। इनके अस्तित्व पर ही हमारा अस्तित्व खड़ा है। जितनी जीने के लिए श्वास की आवश्यकता है, उतनी ही पुण्य अर्जन करने के लिए तीर्थों की आवश्यकता है। मैं यह नहीं कह रही हूं कि हमारे सहयोग के अभाव में तीर्थों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा पर वहां पर काम करने वालों की आस्था और श्रद्धा कमजोर हो सकती है।

15 प्रतिशत बचाकर रखें पूरा खर्च न करें

उसमें समाज के सक्षम वर्ग का यथाशक्ति सहयोग हो, कर्तव्य निर्वहन की जिम्मेदारी हो और उसमें आने वाले कर्मचारी बंधुओं को काम मिले और जो पैसा आए उससे तीर्थ क्षेत्र का संरक्षण और सेवाकर्मियों एवं साधुओं का आहार विहार सामान्य रूप से संभव हो। आर्थिक बजट तय किया जाए, पूरा खर्च न करते हुए 15 प्रतिशत बचाकर रखें। जो किसी प्रकार की त्रासदी के समय में काम आ सके। इससे तीन फायदे हैं।

तीर्थों की आय का स्रोत तय होगा, हमारे सहकर्मी बंधुओं को काम और आत्मनिर्भरता मिलेगी, शुद्ध खाद्य पदार्थ घर-घर पहुंचेगा।

सभी पंथों को एकजुट होना होगा

इस पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए क्योंकि, आने वाला समय और भी विकट और संकट वाला हो सकता है। अभी भी हम सचेत नहीं हुए और पंथ संत में उलझते रह गए तो समझना कि आगे जाकर न पंथ बचेंगे और न ही संत। मेरा विचार है- सामाजिक विकास के लिए मनभेद मतभेद मिटाकर, सभी पंथों को एकजुट होना होगा। जिस की श्रद्धा जिस पंथ और संत पर वह उसकी व्यक्तिगत है और वह रहना भी चाहिए। किंतु सामाजिक विकास, तीर्थ स्थलों की आत्मनिर्भरता और संत की सेवा में सबका साथ होना चाहिए तभी हम अपनी संस्कृति का संरक्षण कर सकते हैं। पत्रकार संगठन अपने बैनर तले किसी तीर्थ के विकास का मन बनाता है तो मैं अपनी सेवा देने के लिए तैयार हूं।

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