आठ दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान के दूसरे दिवस मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो समय का सदुपयोग करते हैं, वो इतिहास रचते हैं और जो समय का दुरपयोग करते हैं, वे मानव पर्याय को यूं हीं बर्बाद करते हैं। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…
मुरैना। आठ दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान के दूसरे दिवस मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो समय का सदुपयोग करते हैं, वो इतिहास रचते हैं और जो समय का दुरपयोग करते हैं, वे मानव पर्याय को यूं हीं बर्बाद करते हैं। साधु संत अपने एक-एक पल का सदुपयोग करते हैं, वे चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते यानि कि प्रतिपल, हर समय प्रभु का स्मरण, प्रभु की स्तुति और मंत्रों का जप करते हुए संयम की साधना में लीन रहते हैं। सांसारिक प्राणियों को भी अपनी व्यस्तम जिंदगी में समय का सदउपयोग करना चाहिए। जैन धर्म में समय का उपयोग मुख्य रूप से सामायिक, दैनिक जीवन में मौन और स्वाध्याय के माध्यम से बताया गया है। सामायिक में धर्म-ध्यान, आत्म-चिंतन और संसार की नश्वरता पर विचार किया जाता है। सांसारिक प्राणीयो द्वारा व्यस्त दिनचर्या में भी, जैसे मॉर्निंग वॉक या यात्रा के दौरान, मौन रहकर, प्रभु का स्मरण करते हुए णमोकार मंत्र आदि का जाप करके समय का सदुपयोग किया जा सकता है। सामायिक एक प्रतिदिन की जाने वाली धार्मिक क्रिया है। जिसमें समतापूर्वक शांत होकर धर्म-ध्यान किया जाता है, जो कि गृहस्थ और साधु दोनों के लिए अनिवार्य है। जैन धर्म में समय का सदुपयोग आत्म-शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सामायिक जैसी क्रियाएं व्यक्ति को धार्मिक जीवन के करीब लाती हैं और उसे आध्यात्मिक प्रगति में मदद करती हैं।
आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज का 5 वां समाधि दिवस
मुरैना में जन्में सराकोद्धारक आचार्यश्री ज्ञानसागर जी महाराज की 5वीं समाधि स्मृति दिवस पर मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कहा कि आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज ने जैनेश्वरी दीक्षा लेकर जीवनपर्यंत भगवान महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित सत्य, अहिंसा, जीवदया, शाकाहार और जियो और जीने दो के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करते हुए प्राणी मात्र को संयम और सादगी के साथ जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। जैन सिद्धांतों से भटके हुए सराक बंधुओं को धर्म की मूलधारा में शामिल करने का कारण वे सराकोद्धारक के नाम से संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध हुए। पूज्य श्री की प्रेरणा से अनेकों मंदिरों, धर्मशालाओं, तीर्थों, संस्थाओं का निर्माण हुआ। आचार्यश्री ज्ञानसागर जी ने मुरैना को जैन तीर्थ के रूप में ‘ज्ञानतीर्थ’ जैसी अनुपम कृति प्रदान की। आज भले ही पूज्यश्री हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनके उपदेश, उनकी शिक्षाएं, उनके द्वारा दिए गए संस्कार उन्हें सदैव सदैव हमारे हृदय में जीवंत बनाए रखेंगे। हम सभी को चाहिए कि एकजुटता के साथ उनके द्वारा छोड़े गए कार्यों को पूर्ण करते हुए उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने का प्रयास करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
विधान में रविवार को 64 अर्घ्य होगे समर्पित
प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने बताया कि 8 दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में रविवार को तृतीय दिन सिद्धों की आराधना, पूजा, भक्ति, उपासना, स्तुति करते हुए इंद्र इंद्राणियों ने अष्टद्रव्य के साथ 64 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। प्रारंभ में जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा, नित्यमह पूजन के बाद पुण्यार्जक परिवार कैलाशचंद राकेशकुमार जैन पूणारावत परिवार ने मंचासीन मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज के पाद प्रक्षालन करते हुए उन्हें शास्त्र भेंट किए। धर्मसभा के मध्य सराकोद्धारक आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलित किया गया। भक्तिरस में सरोवर सभी लोग सिद्ध परमेष्ठियों का गुणगान कर रहे थे।













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