अतिशय क्षेत्र मंगलगिरी सागर में शनिवार को जिनबिंब पंच कल्याणक गजरथ महोत्सव के अवसर पर आचार्य विशुद्धसागर महाराज के ससंघ सानिध्य में आर्यिका विजिज्ञा श्री माता जी के कर कमलों से भव्य जैनेश्वरी दीक्षा समारोह संपन्न हुआ। सागर से पढ़िए, यह खबर…
सागर /इंदौर। श्री मज्जिनेंद्र जिनबिंब पंच कल्याणक सप्त गजरथ महामहोत्सव समिति, सकल दिगंबर जैन समाज एवं स्यादवाद शिक्षण परिषद ट्रस्ट अतिशय क्षेत्र मंगलगिरी सागर के तत्वावधान में शनिवार को जिनबिंब पंच कल्याणक गजरथ महोत्सव के अवसर पर आचार्य विशुद्धसागर महाराज के ससंघ सानिध्य में आर्यिका विजिज्ञा श्री माता जी के कर कमलों से भव्य जैनेश्वरी दीक्षा समारोह संपन्न हुआ। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस अवसर पर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर के भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ के मुख्य अन्वेषक गणित विज्ञानी प्रो.अनुपम जैन द्वारा लिखित पुस्तक जैन गणित की प्रथम प्रति आचार्य विशुद्ध सागर महाराज को समर्पित की। दीक्षा लेने वाली ब्रह्मचारिणी रूबी दीदी और ब्रह्मचारिणी सरस्वती दीदी ने जेनेश्वरी दीक्षा के लिए आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज संसघ से जेनेश्वरी दीक्षा अंगीकार करने का निवेदन किया। जिसे आचार्य श्री ने जेनेश्वरी दीक्षा देने का मंगलमय आशीर्वाद दिया।
दीक्षा प्रदाती आर्यिका विजिज्ञाश्री माताजी ने दोनों दीक्षार्थी बहनों को मोक्ष मार्ग पर चलने के नियम दिलाए और दीक्षा संस्कार देकर मार्गदर्शन प्रदान किया। इस अवसर पर आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी ने कहा कि श्रमण परंपरा के प्रमुख सिद्धांत प्रथम जैन तीर्थकर भगवान ऋषभ देव के समय से चले आ रहे हैं और आज भी वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है। इस चर्या का जीवन में विशेष महत्व है और हमें अच्छी चर्या का पालन करना चाहिए। वैराग्य का मार्ग अपने जीवन को मोक्ष मार्ग पर ले जाने वाला होता है। इसलिए आत्म दीक्षा को अपनाते हुए हमें अपना आत्म कल्याण करना चाहिए। संपूर्ण भारत से पधारे समाज जन ने भी दीक्षा का अनुमोदना की।













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