सोमवार को सबकुछ व्यवस्थित और नित्य की तरह ही चल रहा था। अचानक एक ट्रक लहराते हुए आया और जीवन को रौंदते हुए मानवता की चीख निकाल गया। हादसा इतना विभत्स था कि पत्थर दिल इंसान भी सजल नेत्र लेकर घायलों की मदद को दौड़े इस हादसे ने इतना दर्द दिया कि एक रचनकार की रचना में भी वही दर्द सिसकता नजर आया। पढ़िए मनीषा गुगलिया की यह कविता…
कालानी नगर का ख़ूनी ट्रक-प्रशासन सोया, जनता रोई
कालानी नगर की सड़क पर,
एक ट्रक काल का दूत बन आया,
रौंद डाली कई ज़िंदगियां
हर दिल में मातम छाया।
एयरपोर्ट रोड से निकला था वो,
नो-एंट्री का बोर्ड भी चुप रह गया,
पुलिस खड़ी थी, आंखें मूंदे,
कानून का पहरेदार भी बह गया।
एरोड्रम थाने के सामने से गुज़रा,
जहां कानून की नब्ज़ धड़कनी चाहिए थी,
पर हाथ न उठे रोकने को,
जिम्मेदारी वहीं दम तोड़ती रही।
कालानी नगर चौराहे पर भी,
चार-पांच पुलिस वाले थे,
पर ड्यूटी का जज़्बा गायब था,
बस मूक पुतले खड़े थे।
छोटी-छोटी गलती पर चालान काटते,
‘कागज़ी शेर’ बन जाते हैं,
पर मौत को रोकने की घड़ी आई,
तो सब गूंगे-बहरे बन जाते हैं।
अब फिर वही होगा
निलंबन-बहाली का खेल,
कुछ दिन शोर मचेगा,
फिर सब लौट आएंगे
नेता भाषण देंगे,
समाज निंदा करेगा,
और मासूमों का खून,
सड़क पर बहता रहेगा।
पर जिनके घर के दीप बुझ गए,
उनके आंसुओं का मोल कौन चुकाएगा?
बच्चों का भविष्य जो अंधियारा हुआ,
उसकी कीमत कौन लगाएगा?
सच यह है-दोषी केवल वे नहीं,
हम जनता भी उतने ही हैं,
जो चुप रहकर तमाशा देखते,
और डरकर कभी न बोलते हैं।
जब तक जनता जागेगी नहीं,
जब तक सड़कों पर गूंजेगी नहीं आवाज़,
तब तक मौत ऐसे ही दौड़ेगी,
और प्रशासन करता रहेगा आंखों से राज़।
जनजागरण की अपील
इंदौरवासियों! अब और खामोशी नहीं!
न्याय की मांग करो, जिम्मेदारी तय करो!
हर आवाज़ मायने रखती है, वरना अगली चीख़ शायद हमारी हो!
लेखिका- मनीषा गुगलिया













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