अषाढ़ कृष्ण दूज 23 जून रविवार को जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का गर्भ कल्याणक जैन धर्मावलंबियों द्वारा सम्पूर्ण विश्व में मनाया जाएगा। यह इस कल्पकाल अथवा कालखंड का तीर्थंकर सम्बंधित प्रथम महोत्सव था, जिसे देवों द्वारा मनाया गया था। चूंकि यह वर्ष पारस वीर निर्वाण महोत्सव वर्ष भी जिसे पारस वीर सदी के रूप में मनाया जा रहा है। अतः यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाएगा। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
बदनावर। अषाढ़ कृष्ण दूज 23 जून रविवार को जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का गर्भ कल्याणक जैन धर्मावलंबियों द्वारा सम्पूर्ण विश्व में मनाया जाएगा। यह इस कल्पकाल अथवा कालखंड का तीर्थंकर सम्बंधित प्रथम महोत्सव था, जिसे देवों द्वारा मनाया गया था। चूंकि यह वर्ष पारस वीर निर्वाण महोत्सव वर्ष भी जिसे पारस वीर सदी के रूप में मनाया जा रहा है। अतः यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाएगा।
विशेष अवसरों से संबंधित
वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि कल्याणक शब्द तीर्थंकर भगवान के जीवन के विशेष अवसरों से संबंधित है। श्रमण संस्कृति के अनुसार हर कालखंड में 24 तीर्थंकर होते हैं। उन सभी के पांच कल्याणक मनाए जाते हैं। जिसमें प्रथम कल्याण गर्भ कल्याण होता है उसके पश्चात जन्म कल्याण तप कल्याण ज्ञान कल्याण और मोक्ष कल्याण। जब कोई महान आत्मा तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके गर्भ में आती है तो उस समय देवों द्वारा विशेष उत्सव मनाया जाता है और तीर्थंकर के गर्भ में आने से 6 माह पूर्व और जन्म लेने तक कल 15 मां रत्नों की वृष्टि की जाती है। यह प्रथम उत्सव राजा नाभी राज एवं रानी मरू देवी राज्य अयोध्या नगरी में मनाया गया था। आदिनाथ भगवान इक्ष्वाकु वंश में हुएं उसी वंश में आगे चल कर भगवान राम का जन्म हुआ था। जिसका उल्लेख हमें पुराणों में मिलता है।
समय-समय पर निकलीं जैन प्रतिमाएं
पाटोदी ने बताया कि बदनावर नगर के भूगर्भ से समय-समय जो जैन प्रतिमाएं प्राप्त हुई उसमें कई प्रतिमाएं भगवान आदिनाथ जी की प्राप्त हुई थी। जो नगर के अलावा भी अन्य नगरों के मंदिर में विराजमान हैं वहीं धार व उज्जैन के संग्रहालय में भी प्रदर्शित हैं। बदनावर नगर में वर्तमान में दिगम्बर श्वेताम्बर दो मंदिर में भगवान आदिनाथ जी की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा विराजमान हैं। वही धार नगर के दिगम्बर जैन मंदिर में आदिनाथ भगवान की एक भव्य प्रतिमा विराजमान हैं जो बदनावर नदी किनारे से प्राप्त हुई थी। इसी प्रकार विगत कुछ वर्षों पूर्व बलवंती नदी के गहरी करण के समय आदिनाथ भगवान की एक विशाल खंडित प्रतिमा निकली थी जिसे बाद में उड़िया मंदिर परिसर में पुरातत्व विभाग द्वारा रखा गया था। इसी प्रकार उज्जैन के जयसिंहपुरा जैन संग्रहालय में आदिनाथ दीर्घा में 112 क्रमांक पर प्रदर्शित एक प्रतिमा जिसके प्राप्त स्थान का विवरण उपलब्ध नहीं है सम्भवतः बदनावर से ही प्राप्त हुई थी।
देश में कई जगह है विशाल व प्राचीन जिनबिम्ब
वर्तमान में हम ऋषभदेव आदिनाथ जी की मुर्ति अथवा तीर्थ क्षेत्र के की बात करें तो भगवान ऋषभदेव जी की एक 84 फुट की विशाल प्रतिमा भारत में मध्य प्रदेश राज्य के बड़वानी जिले में बावनगजा नामक स्थान पर अवस्थित है। मांगीतुंगी (महाराष्ट्र ) में भगवान ऋषभदेव की 108 फुट की विशाल प्रतिमा है। ग्वालियर के गोपाचल पर्वत पर उत्कीर्ण हजारों जिनप्रतिमाओं में ऋषभदेव की कई प्रतिमाएं देखी जा सकती है। उदयपुर जिले के एक प्रसिद्ध शहर का नाम भी “ऋषभदेव” है जो भगवान ऋषभदेव के नाम पर ऋषभदेव पड़ा। यहां पर भगवान ऋषभदेव का एक विशाल जैन मंदिर विद्यमान है। भगवान आदिनाथ ऋषभदेव की विशाल पद्मासन प्रतिमा मूलनायक के रूप में सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर जिला दमोह में एक विशाल नागौरी शैली में निर्मित लाल पाषाण के मंदिर में विराजमान है। इस प्रतिमा को बड़े बाबा के नाम से जाना जाता है। भारत में अनेकों स्थान पर ऋषभनाथ भगवान के जिनालय विद्यमान हैं। इनमें कुछ अति प्राचीन हैं। बद्रीनाथ में भी ऋषभदेव को शिव रूप में पूजा जाता है। तमिलनाडु कर्नाटक में प्रचुर मात्रा में से पर्वतों पर गुफाओं में जिनप्रतिमाओं का निर्माण हुआ है जो अतिप्राचीन है।
कुछ प्राचीन मंदिरों के नाम भी आदिनाथ के नाम से विख्यात है जैसे आदिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र चांदखेड़ी खानपुर राजस्थान, दिगंबर जैन दर्शनोदय अतिशय क्षेत्र थूबोनजी जिला अशोकनगर मध्य प्रदेश, दिगंबर जैन सर्वोदय तीर्थ क्षेत्र अमरकंटक आदि प्रमुख हैं। भगवान आदिनाथ का मंदिर खजुराहो का एक प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर पूर्वी मंदिर समूह में स्थित है। इस मंदिर में भगवान आदिनाथ की पत्थर के काले रंग की प्रतिमा देखने के लिए मिलती है, जो बहुत ही खूबसूरत लगती है। देश ही नहीं यहां तक कि विदेश के संग्रहालयों में भी भगवान आदिनाथ की उपस्थिति दर्ज है।













Add Comment