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भगवान श्री आदिनाथ स्वामी का निर्वाण कल्याणक : यत्र यत्र सर्वत्र विद्यमान हैं ऋषभदेव आदिनाथ


आदिनाथ भगवान जी जिन्हें हर धर्म ऋषभदेव, आदि ब्रह्म, प्रजापति, शिव जैसे कई नामों के साथ थोड़े-थोड़े रूप परिवर्तन के साथ मान्यता प्रदान करते हैं। भगवान आदिनाथ का जन्म इस कली काल में चौदहवें कुलकर राजा श्री नाभिराय ओर मरुदेवी के यहां शास्वत तीर्थ अयोध्या में इक्ष्वाकुवंश (क्षत्रिय वंश) में हुआ था। उनके निर्वाण कल्याणक पर पढ़ें ओम पाटोदी की विशेष रिपोर्ट…


बदनावर(वर्द्धमानपुर)। आदिनाथ भगवान जी जिन्हें हर धर्म ऋषभदेव, आदि ब्रह्म, प्रजापति, शिव जैसे कई नामों के साथ थोड़े-थोड़े रूप परिवर्तन के साथ मान्यता प्रदान करते हैं। भगवान आदिनाथ का जन्म इस कली काल में चौदहवें कुलकर राजा श्री नाभिराय ओर मरुदेवी के यहां शास्वत तीर्थ अयोध्या में इक्ष्वाकुवंश (क्षत्रिय वंश) में हुआ था, जिसमें आगे चलकर श्री राम उसी अयोध्या नगरी में जन्मे थे। उन्होंने अपने लाखों वर्ष के जीवन काल में इस सृष्टि के प्रारंभ में जनमानस को असी मसी कृषि शिल्प वाणिज्य एवं व्यापार आदि की शिक्षा दी अर्थात उन्हीं के द्वारा खेती करना सिखलाया गया एवं उन्हीं के समय से अक्षर एवं गिनती का ज्ञान प्रारंभ हुआ था।

 आदिनाथ की जीवन पथ 

राजा ऋषभ देव के भरत चक्रवर्ती एवं बाहुबली आदि सौ पुत्र और ब्राह्मी एवं सुंदरी नाम की दो बेटियां थी। अपने दोनों बेटों भरत एवं बाहुबली को सौंप कर वन को चले जाते हैं, जहां वह 6 महीने तक घोर तपस्या करते हैं। केवल्य ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष में सत्य धर्म कि प्रचार प्रसार किया। जब भगवान की आयु 14 दिन शेष रहती है वह कैलाश पर्वत पर जाकर माघ कृष्ण चतुर्दशी को कैलाश पर्वत (अष्टापद) से मोक्ष निर्वाण को प्राप्त करते हैं, एवं संसार के आवागमन से मुक्त हो जाते हैं।

 आदिनाथ भगवान की ऐतिहासिक प्रतिमाएं 

भगवान आदिनाथ के प्राचीन शिल्प (प्रतिमाओं) की बात करें तो हम पाते हैं कि भारत ही नहीं देश-विदेश में भी आदिनाथ भगवान की कई प्रतिमाएं विराजमान है सभी का उल्लेख करना संभव नहीं है अतः हम भारतवर्ष के संग्रहालय एवं जैन मंदिरों में विद्यमान आदिनाथ भगवान की कुछ प्रतिमाओं का विवरण यहां दे रहे हैं। देश में ऐसे कई ऐतिहासिक स्थान है जहां कई विशाल व प्राचीन जिनबिम्ब हमें देखने को मिलते है। भगवान ऋषभदेव जी की एक 84 फुट की विशाल प्रतिमा भारत में मध्य प्रदेश राज्य के बड़वानी जिले में बावनगजा नामक स्थान पर अवस्थित है। मांगीतुंगी (महाराष्ट्र ) में भगवान ऋषभदेव की 108 फुट की विशाल प्रतिमा है। ग्वालियर के गोपाचल पर्वत पर उत्कीर्ण हजारों जिनप्रतिमाओं में ऋषभदेव की कई प्रतिमाएं देखी जा सकती है। उदयपुर जिले के एक प्रसिद्ध शहर का नाम भी “ऋषभदेव” है जो भगवान ऋषभदेव के नाम पर ऋषभदेव पड़ा। यहां पर भगवान ऋषभदेव का एक विशाल जैन मंदिर विद्यमान हैं । भगवान आदिनाथ ऋषभदेव की विशाल पद्मासन प्रतिमा मूलनायक के रूप में सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर जिला दमोह में एक विशाल नागौरी शैली में निर्मित लाल पाषाण के मंदिर में विराजमान है इस प्रतिमा को बड़े बाबा के नाम से जाना जाता है। चांदखेड़ी राजस्थान में आदिनाथ स्वामी जी का भव्य जिनालय है।इसी प्रकार भारत में अनेकों स्थान पर ऋषभनाथ भगवान के जिनालय विद्यमान है इनमे कुछ अति प्राचीन है। बद्रीनाथ में भी ऋषभदेव को शिव रूप में पुजा जाता है। तमिलनाडु कर्नाटक में प्रचुर मात्रा में से पर्वतों पर गुफाओं में जिनप्रतिमाओं का निर्माण हुआ है जो अतिप्राचीन है।

 आदिनाथ के नाम से प्रसिद्ध जैन तीर्थ 

कुछ प्राचीन मंदिरों के नाम भी आदिनाथ के नाम से विख्यात है जैसे आदिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र चांदखेड़ी खानपुर राजस्थान, दिगंबर जैन दर्शनोदय अतिशय क्षेत्र थूबोनजी जिला अशोकनगर मध्य प्रदेश, दिगंबर जैन सर्वोदय तीर्थ क्षेत्र अमरकंटक आदि प्रमुख हैं। भगवान आदिनाथ का मंदिर खजुराहो का एक प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर पूर्वी मंदिर समूह में स्थित है। इस मंदिर में भगवान आदिनाथ की पत्थर के काले रंग की प्रतिमा देखने के लिए मिलती है, जो बहुत ही खूबसूरत लगती है। देश ही नहीं यहां तक कि विदेश के संग्रहालयों में भी भगवान आदिनाथ की उपस्थिति दर्ज है।

 वर्द्धमानपुर के आदिनाथ 

बदनावर नगर (जिसका प्राचीन नाम वर्द्धमानपुर था) के भूगर्भ से समय-समय जो जैन प्रतिमाएं प्राप्त हुई उसमें कई प्रतिमाएं भगवान आदिनाथ जी की प्राप्त हुई थी। जो नगर के अलावा भी अन्य नगरों के मंदिर में विराजमान हैं वहीं धार व उज्जैन के संग्रहालय में भी प्रदर्शित हैं। बदनावर नगर में वर्तमान में दिगम्बर श्वेताम्बर दो मंदिर में भगवान आदिनाथ जी की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा विराजमान हैं। वही धार नगर के दिगम्बर जैन मंदिर में आदिनाथ भगवान की एक भव्य प्रतिमा विराजमान हैं जो बदनावर नदी किनारे से प्राप्त हुई थी। इसी प्रकार विगत कुछ वर्षों पूर्व बलवंती नदी के गहरी करण के समय आदिनाथ भगवान की एक विशाल खंडित प्रतिमा निकली थी जिसे बाद में उड़िया मंदिर परिसर में पुरातत्व विभाग द्वारा रखा गया था। इसी प्रकार उज्जैन के जयसिंहपुरा जैन संग्रहालय में आदिनाथ दीर्घा में 112 क्रमांक पर प्रदर्शित एक प्रतीमा जिसके प्राप्त स्थान का विवरण उपलब्ध नहीं है सम्भवतः बदनावर से ही प्राप्त हुई थी।

 सरकारी रिकॉर्ड में पहली प्राचीन आदिनाथ प्रतिमा 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की बात करें तो सबसे पहली अतिप्राचीन मूर्ती लगभग 136 वर्ष पूर्व जो भूगर्भ से प्राप्त हुईं थीं। यह प्रतिमा वर्ष 1888-1891 की खुदाई के दौरान मथुरा के कंकाली टीला नामक स्थान से प्राप्त हुईं थीं। वर्तमान में यह प्रतिमा मथुरा के राजकीय जैन संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। यहां से उस समय खुदाई में 737 जैन प्रतिमाएं, शासन देवताओं और आयगपट्ट आदि पुरातत्व महत्व की सामग्री प्राप्त हुईं थीं। इस स्थान की अभी और खुदाई की जाए तो यहां से सैकड़ो जिन प्रतिमाएं प्राप्त होने की प्रबल संभावनाएं हैं। इस टीले पर कंकाली देवी का मन्दिर है, इसलिये इसका नाम ‘कंकाली टीला’ है। 1888-91 में डॉ फुहरर के नेतृत्व में यहाँ खुदाई हुई जिसमें प्रसिद्ध जैन स्तूप मिला। इन कलाकृतियों को तीन भागों में विभक्त किया गया। प्रथम तीर्थंकरों की मूर्तियां द्वितीय शासन देवताओं की मूर्तिया और तिसरी आयगपट्ट। यह आदिनाथ जी की प्रतिमा वहां के रिकॉर्ड के अनुसार लगभग तीसरी शताब्दी की बताईं जाती है। हालांकि यह प्रतिमा उससे भी ज्यादा प्राचीन हो सकती है। लखनऊ संग्रहालय में स्थित एक अभिलेख के अनुसार यहां के जैन स्तूप में प्रतिमा की स्थापना का विवरण 157 ई. का है। यहां की कई प्रतिमाओं को अंग्रेजी शासन काल में बहार भेज दिया गया था।

 जैन मान्यता के अनुसार आदिनाथ प्रतिमाएं 

शासकीय विवरण में भले ही आदिनाथ भगवान की प्राचीन प्रथम मथुरा की मानी गई हो परंतु जैन मान्यता के अनुसार आदिनाथ भगवान की कई प्रतिमाएं मंदिरों में विराजमान है और कई भूगर्भ से प्राप्त प्रतिमाएं हैं जो कि चतुर्थ कालीन अर्थात आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व और उससे भी पहले की मानी जाती है।

 अष्ट धातु की आदिनाथ प्रतिमा 

आदिनाथ भगवान की पाषाण प्रतिमा के अलावा अष्टधातु, पीतल, तांबा , आदि धातुओं की भी कई प्रतिमा में अनेक मंदिर संग्रहालयों में विराजमान है जो की बहुत प्राचीन प्रतिमा है। ऐसी ही एक प्रतिमा चेन्नई के राजकीय संग्रहालय में क्रमांक 45 पर प्रदर्शित है इस प्रतिमा में 24 तीर्थंकरों की प्रतिमा मौजूद है जिसमें संग्रहालय के विवरण के अनुसार मुलनायक (मध्य भाग में) महावीर भगवान बताए गए हैं जबकि इसके वृषभ चिन्ह और सिर पर कैश विन्यास को देखते हुए यह प्रतिमा भगवान में ऋषभदेव आदिनाथ की है।

 दक्षिण भारत में आदिनाथ 

दक्षिण भारत की बात करें तो कर्नाटक तमिलनाडु में प्रचुर मात्रा में जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं विराजमान है जिसमें आदिनाथ भगवान की कई प्राचीन प्रतिमाएं हमें दिखाई देती है। कर्नाटक प्रांत में कई मंदिरों में आदिनाथ भगवान विराजमान है तो वही तमिलनाडु में पर्वतों और गुफाओं में अति प्राचीन आदिनाथ भगवान की मूर्तियां बनाई गई है। यह भारतीय सनातन जैन संस्कृति के अति प्राचीन अवशेषों में से है।

आदिनाथ भगवान की निर्वाण कल्याणक के अवसर पर यह जानकारी बहुत ही संक्षिप्त रूप में दी गई है ऐसे कई हजारों विवरण हमें भारतीय पुरातत्व विभाग, जैन मंदिर गुफाओं और पहाड़ों पर मिलते हैं।

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