संस्कृत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना है। यह प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक का सेतु है। यह विचार व्याख्यानमाला में रोहिणी जैन ने रखे। उन्होंने कहा कि संस्कृत हजारों वर्षों से ज्ञान, विज्ञान, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में पथप्रदर्शक है। टीकमगढ़ से पढ़िए, यह खबर…
टीकमगढ़। संस्कृत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना है। यह प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक का सेतु है। यह विचार रविवार को आयोजित व्याख्यानमाला में विदुषी रोहिणी जैन ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संस्कृत हजारों वर्षों से ज्ञान, विज्ञान, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में पथप्रदर्शक की भूमिका निभाती आ रही है। यह विश्व की सबसे प्राचीन, सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक भाषाओं में से एक है। जैन ने बताया कि संस्कृत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी व्याकरणिक संरचना है। पाणिनि का अष्टाध्यायी विश्व की सबसे सटीक और तार्किक व्याकरणिक रचना मानी जाती है। यही कारण है कि आधुनिक कम्प्यूटर भाषाओं के निर्माण में भी इसे आदर्श माना जा सकता है।
तकनीक से जुड़ाव जरूरी
उन्होंने कहा कि जहां अंग्रेज़ी सहित अन्य भाषाओं में असंगतियां देखने को मिलती हैं, वहीं संस्कृत में पूर्ण स्पष्टता और तार्किकता है। यही कारण है कि जब विश्व में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग का दौर शुरू हुआ, तब शोधकर्ताओं ने पाया कि संस्कृत इन तकनीकों को विकसित करने में अत्यंत उपयोगी हो सकती है।
वैश्विक रुचि जागृत करनी होगी
आज जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन सहित अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में संस्कृत का गहन अध्ययन हो रहा है। जर्मनी के कम से कम 14 विश्वविद्यालयों में संस्कृत पाठ्यक्रम चल रहे हैं, जहां इसे केवल धार्मिक या दार्शनिक दृष्टि से नहीं बल्कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक के परिप्रेक्ष्य में भी पढ़ाया जाता है।
भविष्य की भाषा है संस्कृत
रोहिणी जैन ने कहा कि संस्कृत की शब्द संरचना और व्याकरणिक नियम कंप्यूटरों के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं, क्योंकि इसमें प्रत्येक शब्द और वाक्य का निश्चित और स्पष्ट अर्थ होता है। यही कारण है कि कई शोध संस्थान संस्कृत को भविष्य की तकनीकी भाषा मान रहे हैं। उन्होंने आह्वान किया कि “संस्कृत का पुनर्जीवन भारत को ज्ञान और तकनीक की दिशा में विश्व का नेतृत्वकर्ता बना सकता है। यह भाषा हमारी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए आधुनिकता के साथ तालमेल बैठाने में सक्षम है। संस्कृत को विज्ञान और तकनीक का सेतु बनाया जाए, यही भारत के स्वर्णिम भविष्य की आधारशिला सिद्ध होगी।













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