श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के छठवें दिन मंगलवार को उत्तम संयम धर्म की महिमा पर धर्मसभा हुई। इस अवसर पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री गुरु दत्त सागरजी ने कहा कि संयम का अर्थ है अपने मन, इंद्रियों और इच्छाओं पर स्वैच्छिक रूप से नियंत्रण रखना। महरौनी से पढ़िए, यह खबर…
महरौनी। श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के छठवें दिन मंगलवार को उत्तम संयम धर्म की महिमा पर धर्मसभा हुई। इस अवसर पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री गुरु दत्त सागरजी ने कहा कि संयम का अर्थ है अपने मन, इंद्रियों और इच्छाओं पर स्वैच्छिक रूप से नियंत्रण रखना तथा अनुशासित जीवन जीना। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति संयम का पालन करता है, वह मन, वचन और काय से अपनी गतिविधियों और मानसिक उत्तेजनाओं पर काबू रखता है। इंद्रियों के विषयों से ध्यान हटाकर आत्मा में स्थिरता लाने का पुरुषार्थ करता है। यही कारण है कि जैन दर्शन के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए संयम को पहली सीढ़ी माना गया है।
संयम आत्मा का सहज गुण
मुनि श्री मेघदत्त सागरजी ने कहा कि संयम आत्मा का सहज गुण है, जो आध्यात्मिक साधनाओं के लिए अनिवार्य है। संयम से व्यक्ति न केवल शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार गाड़ी में ब्रेक गति को नियंत्रित करता है, उसी प्रकार संयम भी सांसारिक जीवन को संतुलित और नियंत्रित करने में मदद करता है। शाम को मुनि श्री के सानिध्य एवं रश्मि मलैया के मार्गदर्शन में सीता की अग्नि परीक्षा नाटक का दो दिवसीय मंचन हुआ। जिसे श्रद्धालुओं ने खूब सराहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।













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