आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, गणिनी आर्यिका श्री सरस्वती मति, गणिनी आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी पदमपुरा अतिशय क्षेत्र में संघ सहित विराजित हैं। पदमपुरा से राजेश पंचोलिया की यह खबर…
पदमपुरा। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 123 दीक्षा में पदमपुरा में 5 वीं दीक्षा दी। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में बताया कि राजस्थान के बूंदी जिले के गंभीरा में आचार्य श्री धर्मसागर जी का जन्म हुआ। पदमपुरा में पंचकल्याणक के निमित्त संघ का आगमन हुआ। यह एक भगवान का अतिशय है कि यहां पदमपुरा के इतिहास में पहली बार क्षुल्लिका, आर्यिका, मुनि और आज क्षुल्लक दीक्षा देने का हमें अवसर मिला। चतुर्विध संघ में मुनि, आर्यिका क्षुल्लक और क्षुल्लिका होते हैं। क्षुल्लक एवं क्षुल्लिका 11 प्रतिमाधारी उत्कृष्ट श्रावक श्राविका होते हैं। दीक्षा मोक्ष का मार्ग है। इन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ और इन्होंने दीक्षा के भाव व्यक्त किया अणुव्रत और पिच्छी, कमंडल संयम के पालन के लिए दिए गए। शास्त्र से ज्ञान वर्धित होता है। ,दया धर्म होता है। कोमल पिच्छी जो मयूर पंख से बनी होती है, उसे दया धर्म का पालन होकर सूक्ष्म जीवों की रक्षा होती है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में कहा कि दीक्षा की कोई उम्र नहीं होती है, जहां एक 30 वर्षीय बाल ब्रह्मचारी सत्यम भैया ने दीक्षा ली है। वहीं 78 वर्षीय ब्रह्मचारी लादूलाल जी ने दीक्षा ली है। दोनों वर्षों से व्रत प्रतिमाधारी होकर साधना कर रहे हैं। आज दोनों दीक्षार्थी का ड्रेस एड्रेस बदल गया है। क्षुल्लक वेश को धारण कर आगे बढ़ने का भाव रखे हैं।

हमारी भावना है कि वह पदमप्रभ भगवान के सामने भावों को उत्कृष्ट बनावे समता के परिणाम रखें। जिस प्रकार लौकिक जीवन में परिवार में नए सदस्य के आने से आपको खुशी होती है उसी प्रकार नई दीक्षा से संघ में भी वृद्धि हुई है। इसके पूर्व प्रथम दोनों दीक्षार्थियों के केश लोचन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनिश्री हितेंद्र सागर जी ,मुनिश्री चिंतन सागर जी, मुनि श्री प्रभव सागर जी, मुनिश्री दर्शित सागर जी एवं अन्य साधुओं ने किया। मंगल स्नान कर दोनों दीक्षार्थियों ने श्री जी का पंचामृत अभिषेक किया।

दोनों नव दीक्षित क्षुल्लकांे को पिच्छी, कमंडल, शास्त्र किए भेंट
अतिशय क्षेत्र पदमप्रभ जिनालय परिसर में परिवार को सौभाग्य शाली महिलाओं ने चोक पूर्ण किया। दोनों दीक्षार्थियों के पंचमुष्टि केशलोच आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने किए। धोती दुपट्टे के स्थान पर लंगोट ओर दुपट्टा धारण करने के बाद आचार्य श्री ने मस्तक ओर हाथों में अणुव्रत दीक्षा के संस्कार किए। झांतला नीमच मप्र के 7 व्रत प्रतिमाधारी 78 वर्षीय ब्रह्मचारी लादूलाल का दीक्षा उपरांत क्षुल्लक श्री सुभग सागर जी बने। उमापुर बीड महाराष्ट के 30 वर्षीय बाल ब्रह्मचारी सत्यम भैय्या दीक्षा बाद क्षुल्लक श्री सुगुप्त सागर जी बने। दोनों नव दीक्षित क्षुल्लकांे को पिच्छी, कमंडल, शास्त्र, कपड़े और गृहस्थ अवस्था के परिजनों एवं श्री पदमपुरा कमेटी के हेमंत सोगानी, राजकुमार कोठारी, सुरेश सबलावत, महावीर पाटनी एवं अन्य ने दिए। यह सौभाग्य शाली भक्तों ने आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की। संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायश मति के अनुसार 76 वर्षीय आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 58 वर्ष के संयमी जीवन में 36 वर्ष के आचार्य अवधि में अभी तक 123 दीक्षाएं दी हैं। जिसमें 24 दीक्षाएं सिद्ध क्षेत्रों में तथा आज सहित 41 दीक्षा अतिशय क्षेत्र में दी हैं। श्रवण बेलगोला और पदमपुरा में क्षुल्लक, क्षुल्लिका, आर्यिका ओर मुनि दीक्षा दी हैं।













Add Comment