पुण्यात्मा जो एक सदी के बाद भी अपने परोपकार पुण्य कार्यों से भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में इंदौर का नाम रोशन करने वाले बिरले व्यकितत्व के धनी जैन समाज के दानवीर सर सेठ हुकुमचंद जी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा से याद किया गया। इस आधुनिक युग में भी उनके प्रसंगों में विकास और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा मिलती है। इंदौर से पढ़िए, हरिहरसिंह चौहान की यह रिपोर्ट…
इंदौर। पुण्यात्मा जो एक सदी के बाद भी अपने परोपकार पुण्य कार्यों से भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में इंदौर का नाम रोशन करने वाले बिरले व्यकितत्व के धनी जैन समाज के दानवीर सर सेठ हुकुमचंद जी की गुरुवार को पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा से याद किया गया। इस आधुनिक युग में भी उनके प्रसंगों में विकास और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा मिलती है। तभी तो इंदौर के सर सेठ हुकुमचंद जी का नाम अमेरिका के शेयर बाजार यानि स्टाक एक्सचेंज में आज भी स्वर्ण अक्षरों मे अंकित है। वहीं थोडे समय में ही हमारे इंदौर शहर में कपडा मिलों के जनक बने थे। सेठ जी ने लोगों को रोजगार दिया। शहर को अपनी अलग पहचान दिलाई। सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में भी आपके जैसा दानवीर कोई नहीं रहा। जब महात्मा गांधी इंदौर पधारे थे तो उनके स्वागत की जिम्मेदारी सर सेठ हुकुमचंद जी की दी गई थी। जब उनके निवास स्थान इंद्र भवन में गांधीजी ने भोजन किया था तो वह भोजन उस जमाने में चांदी के बर्तनों में कराया गया था तब मजाक में गांधी जी बोले मैं तो जिस बर्तन में भोजन करता हूं, वह अपने पास रख लेता हूं। इस पर बडी विनम्रता से सेठ जी ने कहा था यह तो आपके लिए ही है और उन्हीं के सहयोग और मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति के भवन निर्माण में भी हुकुमचंद जी का योगदान रहा।
विकसित इंदौर में सेठजी का सहयोग कभी भी शहर नहीं भूल सकता। उन्होंने ने पीढ़ियों को सुधार दिया। उस जमाने के भारत के दिगंबर जैन समाज में सबसे बडे नेता के रूप में मार्गदर्शक रहे। मुनियों, त्यागियों के लिए भवन निर्माण, मंदिरों के जीर्णाेद्धार, पंथिक यात्रियों के लिए धर्मशाला, बीमार दुखियों के लिए अस्पताल का निर्माण भी उन्हीं ने करवाया। पुण्यात्मा, परोपकार और परमार्थ के प्रतिरूप को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धा से याद किया जाता है।













Add Comment