दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 145वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे नसूर।
तब लग जीव जग कर्म वश, जब लग ज्ञान ना पूर॥”
कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक आँख में नासूर (घाव) नहीं होता,
तब तक व्यक्ति को तारे (रात्रि की ज्योति) स्पष्ट दिखाई देते हैं।
उसी प्रकार, जब तक मनुष्य को ज्ञान की पूर्णता प्राप्त नहीं होती,
वह कर्मों के वश में रहकर मोह-माया में उलझा रहता है।
जैसे नेत्र में पीड़ा होने पर तारे दिखना बंद हो जाते हैं,
वैसे ही अज्ञान रूपी रोग जब तक भीतर है,
तब तक व्यक्ति सत्य, चेतना और आनंद—इन गूढ़ सत्यों को नहीं देख पाता।
ज्ञान ही वह औषधि है जो कर्मों के बंधन से मुक्ति दिलाती है।
धर्म का उद्देश्य केवल कर्मकांड निभाना नहीं है,
बल्कि आत्मबोध, विवेक और सच्चे ज्ञान की प्राप्ति है।
जब तक व्यक्ति अंध-परंपराओं में लिप्त रहता है,
और अपने आत्मस्वरूप को नहीं पहचानता,
तब तक वह ईश्वर से और स्वयं से दूर बना रहता है।
धर्म तभी जीवित होता है, जब ‘ज्ञान की आंख’ खुलती है।
कबीर चेताते हैं कि जब तक सोचने-समझने की क्षमता विकसित नहीं होती,
तब तक व्यक्ति सामाजिक भीड़, रीति-रिवाज, बाह्य प्रदर्शन और झूठी प्रतिष्ठा का शिकार बना रहता है।
कबीर कहते हैं —
“तब तक व्यक्ति संसार की चमक-दमक में फंसा रहेगा,
जब तक अज्ञान रूपी नासूर उसे पीड़ा न देने लगे।”
आत्मज्ञान के बिना सच्ची सामाजिक और मानसिक स्वतंत्रता असंभव है।
जिस व्यक्ति में ज्ञान का प्रकाश नहीं है,
वह भले ही स्वतंत्र दिखे, पर भीतर से परतंत्र होता है।
जब ज्ञान पूर्ण होता है —
तब विचार, दृष्टिकोण और निर्णय सब शुद्ध और स्पष्ट हो जाते हैं।
जब तक भीतर अज्ञान का अंधकार है,
तब तक बाह्य दुनिया ही सब कुछ लगती है।
लेकिन जब आत्मज्ञान का प्रकाश भीतर जागता है,
तभी जीवन का सच्चा उद्देश्य सामने आता है।













Add Comment