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अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज का धर्म प्रभावना रथ के चौथे पड़ाव का 12वां दिन : घर, परिवार, समाज में कषाय के कारण टूट रहे हैं रिश्ते – मुनि पूज्य सागर


संविद नगर, कनाडिया रोड स्थित आदिनाथ जिनालय में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ के चौथे पड़ाव में 12 दिवसीय वृहद महामंडल विधान का आयोजन 12वें दिन किया गया। इस अवसर पर मुख्य पुण्यार्जक महावीर कनकमाला, अनूप ऋतु बाला, अतुल निधि जैन, अनंत अतिवीर जैन परिवार और 12 दिवसीय सौधर्म इन्द्र डी के जैन, रिटायर्ड डीएसपी माला जैन ने भक्तामर काव्य के 45, 46, 47 और 48 काव्य की आराधना करते हुए 224 अर्घ्य समर्पित किए। इस अवसर पर मुनि श्री के प्रवचन भी हुए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। संविद नगर, कनाडिया रोड स्थित आदिनाथ जिनालय में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ के चौथे पड़ाव में 12 दिवसीय वृहद महामंडल विधान का आयोजन 12वें दिन किया गया।

इस अवसर पर मुख्य पुण्यार्जक महावीर कनकमाला, अनूप ऋतु बाला, अतुल निधि जैन, अनंत अतिवीर जैन परिवार और 12 दिवसीय सौधर्म इन्द्र डी के जैन, रिटायर्ड डीएसपी माला जैन ने भक्तामर काव्य के 45, 46, 47 और 48 काव्य की आराधना करते हुए 224 अर्घ्य समर्पित किए।

अब तक इस आयोजन में कुल 2688 अर्घ्य समर्पित किए जा चुके हैं। इस विशेष अवसर पर शान्तिधारा का लाभ नरेश जैन और माही जैन को प्राप्त हुआ, जबकि दीप प्रज्वलन, चित्रानावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन का लाभ मुख्य पुण्यार्जक को मिला। शास्त्र भेंट का लाभ भावना जैन और प्रतिभा गांधी को मिला।

प्रभु से बनाएं गुणों का रिश्ता

इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने भक्तामर काव्य के 15वें और 16वें काव्य पर प्रवचन देते हुए कहा कि आपने मोहनीय कर्म का नाश कर दिया है, इसलिए आप में कोई कषाय नहीं, राग-द्वेष नहीं है।

आप सब एक समान हैं। आप में किसी प्रकार की विकृति भी नहीं आती है, क्योंकि विकृति तो कषाय आदि के निमित्त आती है। श्रावक को भगवान की प्रतिमा देखकर यह भाव करना चाहिए कि मैं कषाय रहित हो जाऊं, इसके लिए मैं संसार की वह क्रिया धीरे-धीरे छोड़ने का पुरुषार्थ करूंगा, जो कषाय को जन्म देती है।

आज घर, परिवार, समाज में रिश्ते टूट रहे हैं, वह सब कषाय के कारण ही टूट रहे हैं। भगवान आप सब के लिए हैं, इसलिए सब एक हैं, क्योंकि आप में कषाय नहीं है।

उन्होंने कहा कि जो आत्मा की सुनता है, वह राग-द्वेष कषाय से रहित होता है और बाहर के रिश्तों को देखता है, वह अशुभ कर्म का बंध करता है।

आप दुकान आदि में बैठे हों और आपका ध्यान कुछ समय के लिए इधर-उधर हो जाए, तो समझें कि सामने वाले ने आपको चूना लगा दिया है, अर्थात आपका नुकसान कर गया है।

उसी प्रकार, जब आप पूजा, अभिषेक, दर्शन कर रहे हों और आपका ध्यान भगवान के गुणों के अलावा कहीं और चला जाए, तो समझें कि कर्म ने आपको चूना लगा दिया है, अर्थात अशुभ कर्म का बंध हो गया।

जो रिश्ते गुणों से बनते हैं, वह मजबूत होते हैं, और जो रिश्ते चकाचौंध के कारण बनते हैं, वह टूटते हैं।

इसलिए प्रभु से गुणों का रिश्ता बनाकर स्वयं गुणवान बन जाओ।

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