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धर्मसभा में दिए प्रवचन : णमोकार मंत्र का एक पद का भी उच्चारण करते-करते अज्ञान दशा में अर्जित पाप धुल सकता है – आचार्य श्री समयसागर 


सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युगश्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा मोक्ष मार्ग पर चलने वाले साधक हुआ करते हैं। श्रमण हुआ करते हैं वे अपने जीवन में रत्नत्रय की आराधना करते हुए दीर्घकाल व्यतीत करते है। रत्नत्रय की आराधना के फल स्वरूप उन्हें अनेक प्रकार की ऋद्धियां भी प्राप्त हो जाती हैं। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…


कुंडलपुर (दमोह) । सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युगश्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा मोक्ष मार्ग पर चलने वाले साधक हुआ करते हैं। श्रमण हुआ करते हैं वे अपने जीवन में रत्नत्रय की आराधना करते हुए दीर्घकाल व्यतीत करते है। रत्नत्रय की आराधना के फल स्वरूप उन्हें अनेक प्रकार की ऋद्धियां भी प्राप्त हो जाती हैं। अवध ज्ञान भी प्राप्त हो सकता है मन: पर्याय ज्ञान भी प्राप्त हो सकता है उन ऋद्धियों के प्रति अवध ज्ञान, मन: पर्याय ज्ञान आदि जो क्षयोपशम ज्ञान है उनकी दृष्टि नहीं जाती किंतु उनकी दृष्टि मात्र रत्नात्रय की ओर जाती है मोक्ष का जो मार्ग है वह ऋद्धि संपन्न जो श्रमण होते हैं उन्हीं के लिए मोक्ष मार्ग बनता है ऐसा नहीं ।मोक्ष मार्ग में यह सारे के सारे सहायक तत्व नहीं है सहायक कोई है तो रत्नत्रय की आराधना है ।

और वे रत्नत्रय की आराधना करते हुए पंच परमेष्ठी को भूलते नहीं णमोकार मंत्र का उच्चारण उनके मुख से भी निकलता है। आपने प्रथमानुयोग आदि ग्रंथों में प्रसंग सुना होगा एक ग्वाला है ग्वाला गायों का चराने वाले को बोलते ।दिनभर गायों को चराकर दिन अस्त होने को है और घर लौट रहा है ।किंतु समय कौन सा था शीतकालीन वह समय है कड़ाके की ठंड पड़ रही है ठंडी लहर चल रही है और वह घर की ओर लौट रहा है बीच में एक दृश्य देखने को मिल रहा है वह दृश्य कौन है एक मुनि महाराज जो ध्यान में लीन है नदी के किनारे हैं और जंगल में है चारों ओर वहां पेड़ पौधे हैं वह ग्वाला सोच रहा है कंबल भी ओड़ रखा है मैंने इसके उपरांत भी शीत का निवारण नहीं हो पा रहा है और यह साधु खड़े हैं दिगंबर हैं बदन पर वस्त्र नहीं है ।

इसके उपरांत शीत का प्रतिकार कौन कर सकता है कब तक खड़े रहेंगे बैठेंगे क्या कोई अनुमान नहीं है। संभव है रात भर खड़े हो जाए ऐसा सोचकर वह विचार करता है उनके लिए क्या कर सकता हूं। मेरे पास कंबल है उड़ा नहीं सकता हूं साधू है। सूखी लकड़ी है जो जंगल में उनको एकत्रित करके जला दी अग्नि जला दी चारों ओर ।वह सोचता में भी इस अग्नि के माध्यम से शीत का निवारण कर लूं ।रात भर सेवा में है वह ग्वाला सोचता कुछ मिल जाएगा। प्रातः ध्यान से उठेंगे तो हमारे लिए कुछ शब्द सुनने मिलेंगे। हमारे लिए कुछ मार्ग उनके द्वारा प्राप्त हो जाएगा ।वह प्रतीक्षा में है और प्रातः होते ही वह मुनिराज ऋद्धि संपन्न थे चरण रिद्धि प्राप्त थी ।ग्वाले ने कहा हमारे लिए कुछ प्रसाद दे दो मैं भी अपने जीवन का कल्याण कर सकूं अच्छे ढंग से जीवन यापन कर सकूं।

तो उन्होंने कहा णमो अरहंताणं उच्चारण कर लिया और आकाश मार्ग से अदृश्य हो गए। पूरा णमोकार मंत्र भी नहीं मिला ।वह ग्वाला णमो अरहंताणं का उच्चारण करता रहा और सुनने में आया सुदर्शन सेठ हुआ। इधर हम एक करोड़ जाप कर रहे जाप करते हमारा उपयोग पंच परमेष्ठि में जाना चाहिए यह आस्था का विषय है ज्ञान नहीं है हम ज्ञान की बात करना चाहते समर्पण नहीं है। जो समर्पित हो जाता णमो अरहंताणं एक पद भी पर्याप्त है क्योंकि उसके उच्चारण करते-करते अज्ञान दशा में अर्जित जो पाप है वह धुल सकता है ।भावपूर्ण उच्चारण किया हो तो। इस प्रकार प्रथमानुयोग ग्रन्थो में प्रसंग मिलते हैं ।सुनकर विस्मय होता एक सेकंड नहीं लगता विकास प्रारंभ हो जाता है।

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