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दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी कमेटी की बैठक में आगामी कार्यक्रम की रूपरेखा बनी : मुनिश्री ने रूपातीत ध्यान पर दिया मार्गदर्शन


अशोकनगर में राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने विशाल धर्मसभा में समयसार के चिंतन पर आधारित प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि आरस परंपरा में नमक का स्वाद अभाव में सदभाव का अनुभव करता है। मुनिश्री ने रूपातीत ध्यान, सद्भाव में अभाव की अनुभूति और जीवन के गूढ़ आध्यात्मिक तत्वों को सरल शब्दों में समझाया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…


अशोकनगर। सुभाषगंज मैदान में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि “आरस परंपरा में नमक का स्वाद अभाव में सद्भाव का अनुभव करता है। अभाव में सद्भाव का अनुभव करना तो सरल है, लेकिन सद्भाव में अभाव का अनुभव करना अत्यंत कठिन है।”

उन्होंने कहा कि मनुष्य नहीं होने की अनुभूति लाना बहुत कठिन है। जो पद, प्रतिष्ठा और सम्मान हमारे पास हैं, उन्हें भूल जाना ही आत्मानुभूति की दिशा में पहला कदम है। ज्ञानी व्यक्ति ज्ञान को भूलने को तैयार नहीं होता, जबकि अज्ञानी व्यक्ति ज्ञान का अनुभव कर सकता है। यदि व्यक्ति स्वयं को भूलकर आत्मस्वरूप में स्थित हो जाए तो वही अवस्था ‘सद्भाव में अभाव’ कहलाती है।

गरीब अमीरी की अनुभूति कर सकता, अमीर गरीबी की करें तो जाने

मुनिश्री ने कहा कि “गरीब आदमी अमीरी की अनुभूति कर सकता है, लेकिन अमीर व्यक्ति गरीबी की अनुभूति करे तो यह अत्यंत कठिन कार्य है।” उन्होंने कहा कि रूपातीत ध्यान का अर्थ है अपने शरीर का अभाव देखना। जैसे अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश तो कर गया लेकिन बाहर निकलने का मार्ग नहीं जानता था, वैसे ही अनेक साधक निश्चय के मार्ग में तो प्रविष्ट हो जाते हैं लेकिन कर्मबंधन से मुक्ति का मार्ग नहीं जानते।

सद्भाव में अभाव की अनुभूति सर्वोच्च साधना

मुनिश्री ने कहा कि “भोजन में नमक नहीं है तो अभाव का अनुभव तुरंत हो जाता है, परंतु जब भोजन में नमक है और फिर भी उसका स्वाद न महसूस हो, यही सर्वोच्च साधना है।”

उन्होंने बताया कि यही “सद्भाव में अभाव” की अनुभूति है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने स्वभाव को बदलना चाहिए, क्योंकि क्रोध, मान और मोह में डूबा व्यक्ति आत्मज्ञान से दूर हो जाता है।

उदाहरणों से दिया गूढ़ दर्शन का संदेश

अपने प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि “नारी को युद्ध की बात पसंद नहीं आती, वह सौंदर्य और श्रंगार की बातों को अधिक महत्व देती है। अर्जुन की गलती यह थी कि उसने बिना पात्रता देखे शिक्षा दी। शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है, उसे समझना और अनुभव करना आवश्यक है।”

उन्होंने कहा कि हमें अपने अहंकार और अभिमान को त्यागकर आत्मा की पहचान करनी चाहिए।

थूवोनजी कमेटी की बैठक में कार्यक्रम तैयारियों पर चर्चा

दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी में होने वाले आगामी कार्यक्रम को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता थूवोनजी कमेटी अध्यक्ष अशोक जैन (टींगू मिल) ने की।

इस दौरान जैन समाज अध्यक्ष राकेश कासंल, महामंत्री राकेश अमरोद, मंत्री विजय धुर्रा, महामंत्री मनोज भैसरवास, कोषाध्यक्ष सुनील अखाई सहित अनेक सदस्य उपस्थित रहे।

अध्यक्ष अशोक जैन टींगू मिल ने कहा कि “चातुर्मास की सफलता के साथ-साथ अब दर्शनोदय तीर्थ में भी हम उत्कृष्ट व्यवस्था करेंगे। शहर से तीस किलोमीटर दूर तक बेहतर प्रबंधन के लिए सभी का सहयोग आवश्यक है।”

राकेश कासंल ने कहा कि “महाराज की कृपा से अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुके हैं, अब हमें उन्हें अमल में लाना है।”

विजय धुर्रा ने कहा कि “प्रतीष्ठाचार्य प्रदीप भइया के निर्देशन में हम सब मिलकर हर कार्य को आगे बढ़ाएँगे।”

एकता और सहयोग से सफलता की ओर कदम

बैठक में निर्णय लिया गया कि समाज के सभी संगठन मिलकर कार्यक्रम की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से पूरा करेंगे।

मुनिश्री के प्रवचन और समिति की योजनाओं से वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा और सहयोग की भावना व्याप्त रही। थूवोनजी समिति के सभी सदस्य इस पावन आयोजन को सफल बनाने के लिए एकजुटता के साथ संकल्पित दिखाई दिए।

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