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आदि तीर्थंकर ऋषभदेव के तप एवं ज्ञान कल्याणक भूमि तीर्थ ‘प्रयागराज : साहित्य परंपरा और पुरातात्विक दृष्टिकोण 


भगवान ऋषभदेव की तप और ज्ञान कल्याणक भूमि प्रयागराज के बारे में पौराणिक और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर अनछुए पहलुओं का जिक्र किया गया है। भगवान के वैराग्य से लेकर तप और फिर ज्ञान प्राप्त करने के बारे में विस्तार से विभिन्न संदर्भों से प्रस्तुत आलेख में ज्ञानार्जन किया गया है। लखनऊ से पढ़िए शैलेंद्रकुमार जैन की यह रिपोर्ट…


लखनऊ। भगवान ऋषभदेव ने जिन 52 महाजन पदों की रचना की थी। उनमें कौशल जनपद के अंतर्गत पुरिमतालपुर नगर का राज्य अपने पुत्र वृषभ सेन को दिया। नीलांजना अप्सरा का नृत्य करते समय हुई मृत्यु को देखते हुए भगवान को वैराग्य हो गया। उसी क्षण भगवान ने सारा राजपाट त्याग कर सुदर्शन नामक पालकी पर सवार होकर दीक्षा लेने अयोध्या से चल दिए। भगवान पुरिमतालपुर के सिद्धार्थ वन में पहुंचकर पालकी से उतर गए।

सभी प्रकार के परिग्रह का त्यागकर एक वटवृक्ष के नीचे पूर्वाभिमुख होकर चैत्र कृष्ण नवमी के दिन शाम को उत्तरासाढ़ नक्षत्र में दीक्षा ली और छः मास का योग लेकर वटवृक्ष के नीचे आसीन हो गए। उनके साथ भरत के पुत्र मारीच सहित चार हजार राजाओं ने दीक्षा ली। देवों और इंद्रों ने उसी स्थान पर पूजाकर दीक्षा कल्याणक मनाया और वह स्थान प्रयाग इस नाम से प्रसिद्ध हो गया।

आचार्य जिनशेन ने हरिवंश पुराण नवम सर्ग (95/97)/ एवमुक्त्वा प्रजा यत्र प्रजापतिमपूज्यतः! प्रदेशः स प्रजागाख्यो यतः पूजार्थयोगतः/एवं आचार्य रविषेण ने पद्म पुराण तृतीय पर्व (280/81/82)/ प्रजाग इति देशोअ्सौ प्रजाभ्योअस्मिन् गतो यतः! प्रकृष्टो वा कृतस्त्यागः प्रयागस्तेन कीर्तितः/में इस विषय का उल्लेख कर स्पष्ट किया है कि भगवान प्रजा से दूर हो उस स्थान पर पहुंचे, इसलिए उसे जगह का नाम प्रयाग प्रसिद्ध हो गया। जहां दो नदी का संगम होता है। उत्तरांचल में उसे प्रयाग कहा जाता है। जैसे देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रुद्रप्रयाग आदि यहां तीन नदियों का संगम है अतः इसे प्रयागराज कहा जाता है।

फागुन कृष्ण एकादशी को भगवान को केवल ज्ञान हुआ

दीक्षा लेने के बाद भगवान वहां केवल 6 माह तक रहे। इसके बाद विभिन्न देश-प्रदेशों में विहार कर धर्म प्रचार किया। हजार वर्ष बाद भगवान फिर उसी नगर पुरिमतालपुर पहुंचे और शकट नामक वन में वटवृक्ष के नीचे एक शिला पर पर्यंकासन से विराजमान हो गए और फागुन कृष्ण एकादशी को भगवान को केवल ज्ञान हुआ। संपूर्ण देवों और इंद्र ने आकर भगवान की पूजाकर ज्ञान कल्याण मनाया एवं समवशरण की रचना की।

भागवत पुराण के नवम् सर्ग में उनके हस्तिनापुर एवं अयोध्या के निकट पुरिमतालपुर के समवशरण का उल्लेख आता है। मान्यता यह भी अति प्रसिद्ध है कि समुद्र मंथन से मिले अमृत की कुछ बूंदे प्रयागराज मे भी गिरी थीं। अतः हर बारह साल में कुंभ एवं छः साल मे अर्ध कुंभ का विशाल मेला लगता है।

तीर्थ वंदना नामक रचना में प्रयाग का उल्लेख

यह तिथि माघ कृष्ण अमावस्या है जो ऋषभदेव के मोक्ष कल्याणक (माघ कृष्ण चतुर्दशी )के दूसरे दिन पड़ती है। जिसे मौनी अमावस भी कहा जाता है। जिस वटवृक्ष के नीचे भगवान को केवल ज्ञान रूपी अक्षय ज्ञान की प्राप्ति हुई। उसे अक्षयवट कहा जाने लगा। नंदि संघ की गुर्रावली में कहा है कि सम्मेद शिखर, चंपापुरी, उजयंतगिरि, अक्षयवृट आदिश्वर दीक्षा सर्वसिद्धि क्षेत्र कृत यात्राणं, इसमें अक्षयवट तीर्थ का उल्लेख दृष्टव्य है। इसी प्रकार काष्टासंघ नंदी तट गच्छ के भट्टारक श्री भूषण के शिष्य नयनसागर ने 16-17 वीं सदी की अपनी तीर्थ वंदना नामक रचना में प्रयाग का उल्लेख इस प्रकार किया है।

गंगा जमुना मध्य नगर प्रयाग प्रसिद्धह, जिनवार वृषभदयाल धृत संयम मन सुद्धह,

वट प्रयाग तल जैन योग धर्माे सद्भाहस, प्रगटवो तीर्थ प्रसिद्ध पूरत भविमण आसह,

प्रयाग वाट दीखे थके पाप सकलन परिहरे, व्रहत ज्ञान सागर वदति के प्रयाग तीर्थ बहुसुख करें,

अकबर ने यहां किला बनाया था

प्राचीन तीर्थ माला संग्रह भाग 1 पृष्ठ 10-11 के अनुसार प्राचीन समय में यहां भगवान ऋषभदेव के चरण विराजमान थे किंतु 16वीं सदी में राय कल्याण नामक सूबेदार ने चरण हटाकर शिवलिंग स्थापित कर दिया। विविध तीर्थ कल्प के अनुसार आचार्य अवंतिका पुत्र के केवली स्थल के रुप में यहीं पर ऋषभदेव की माता मरुदेवी को केवल ज्ञान प्राप्ति हुई थीजो पुरिमतालपुर के नाम से प्रसिद्ध है श्वेतांबर परंपरा में। रामायण काल में भगवान राम ने भी प्रयागराज मंे इस वटवृक्ष की नीचे पूजा की थी ऐसी मान्यता है। अकबर ने यहां किला बनाया था और इलाही से अल्लाह का ही आश्रय है और आदिदेव की तप ज्ञान भूमि होने पर अल्लाह अर्थात ईश्वर जहां आबाद है उसे इलाहबाद नाम दिया। मान्यता है उसी किले में एक प्राचीन पाषाण स्तंभ जो मौर्य सम्राट संप्रति ने भगवान ऋषभदेव की कल्याणक भूमि होने की स्मृति में निर्माण कराया था (उस स्तंभ को भूल से अशोक स्तंभ कहने लगे) इसके ऊपर प्रियदर्शी ( संप्रति की उपाधि ) उसकी रानी, सम्राट समुद्रगुप्त, बीरबल और जहांगीर के लेख भी खुदे हैं।

…तभी से यह प्रतिमाएं जैन समाज को सुपुर्द कर दी गईं

अंग्रेजों के समय किले मंे किसी कार्यवश खुदाई कराई जाने पर एक कुएं से अनेक जैन खंडित-अखंडित मूर्तियां निकलीं। जिसे अनेक संप्रदाय के लोग मांगने लगे लेकिन, तात्कालिक अधिकारी ने यह कहा कि इसमें सबसे वजनदार मूर्ति को जो उठाकर किले से बाहर ले जाएगा। उसी को यह दी जाएगी किंवदंती है कि छज्जोमल नामक श्रावक ने प्रातः भगवान पारसनाथ की सबसे बड़ी मूर्ति, जो सबसे अधिक वजन की थी। उसे उठाकर किले के बाहर रख दिया और तभी से यह प्रतिमाएं जैन समाज को सुपुर्द कर दी गई। आज भी वह प्राचीन प्रतिमाएं जीरो रोड पर पंचायती दिगंबर जैन बड़े मंदिर जी एवं छोटे मंदिर जी की अनेक वेदियो में विराजमान हैं। बताया जाता है कि अक्षय वट के निकट जहां से मूर्तियां प्राप्त हुई थीं। वहां पर प्राचीन समय में जरूर कोई जैन मंदिर रहा होगा।

सार्वभौमिक जीवन मूल्यों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला

किले में एक पातालपुरी नामक विख्यात मंदिर में विविध वेदी में दुर्गा, शिव, भैरव, भवानी आदि की वैष्णव मूर्तियों सहित एक आले में जैन मूर्ति का एक खंड जिसमें दो अरिहंत प्रतिमाएं हैं। जिसे पंडे आरस-पारस नाम से बताते हैं। किसी जिन मूर्ति का खंड प्रतीत होती है। इसी मंदिर में एक नागदेव की भी विलक्षण पाषाण प्रतिमा विराजित है। मां श्री कौशल जी ने अपनी पुस्तक ‘भगवान ऋषभदेव का भारत में कुंभ’ के विषय में प्रकाश डाला है तथा उसी पुस्तक के प्राक्कथन में योजना भवन के सदस्य सोमपाल ने और प्रस्तावना में पूर्व राज्यपाल उप्र मोतीलाल बोरा एवं मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कुंभ की प्रचलित मान्यताओं और भगवान ऋषभदेव द्वारा दिए गए जन कल्याण के सार्वभौमिक जीवन मूल्यों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है। जो आज भी अधिक प्रासंगिक हैं।

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