प्रभु की भक्ति में मन लग गया और लीन हो गए तो जो चाहे मिल जाएगा। भगवान आपसे प्रसन्न होंगे। ऐसा भ्रम मत पालकर रखना। भगवान केवल उसे मानने से नहीं बल्कि उनके उपदेश अर्थात आज्ञा मानने से प्रसन्न होते हैं। यह प्रवचन शाहगढ़ बड़ा जैन मंदिर में उपाध्याय मुनिश्री विरंजन सागर महाराज ने दिए। पढ़िए मनीष सागर विद्यार्थी की रिपोर्ट…
शाहगढ़। प्रभु की भक्ति में मन लग गया और लीन हो गए तो जो चाहे मिल जाएगा। भगवान आपसे प्रसन्न होंगे। ऐसा भ्रम मत पालकर रखना। भगवान केवल उसे मानने से नहीं बल्कि उनके उपदेश अर्थात आज्ञा मानने से प्रसन्न होते हैं। यह प्रवचन शाहगढ़ बड़ा जैन मंदिर में उपाध्याय मुनिश्री विरंजन सागर महाराज ने दिए। उन्होंने कहा कि भगवान तो वीतरागी हैं, उन्हें किसी से भी राग और दोष नहीं होता। आप उन्हें कुछ दे, मंदिर बनवाएं, पूजा करें, इससे उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता लेकिन उन्होंने जो उपदेश दिया, उनका जीवन जो स्वयं उपदेश बन जाता है। वही आज्ञा माने, आदेश जाने, उसी का पालन करें।
मुनिश्री ने कहा कि पूजा, भक्ति तो वर्तमान में कर्मों को क्षय करने में सहायक होती है, आज का संसारी प्राणी दुख के समय हे भगवान हे राम कहता है। यदि सुख के समय भगवान को याद करें, दुख का होते हुए भी आभास नहीं हो पाता। उपाध्याय श्री ने कहा कि ज्ञान और चरित्र की चिंतन सम्यक दर्शन से आता है। मनुष्य और श्रमण में रत्नात्रय एक साथ या क्रमशः आ सकता है।
क्रम से या एक साथ भी आ सकता है। शब्द याद रहे या ना रहें पर प्रवचन में उसका सार -भाव जरूर याद बना रहता है। हमें संसारी कर्मों की वजह धर्म ध्यान को भी समय अनिवार्य रूप से देना चाहिए। केवल उपदेश पर या दर्शन पर आधारित नहीं, बल्कि वीतरागता का दर्शन और एकाग्र भावों से सुना उपदेश का आत्मिक रूप से अंगीकार करने से श्रावक भी श्रवण के बराबर अंक प्राप्त कर लेता है।













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