मुरैना में पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के परम भक्त श्रावक श्रेष्ठी अनूप भंडारी ने प्रतिक्रमण के महत्व पर प्रकाश डाला। प्रतिक्रमण कर्मों के प्रायश्चित, आत्मनिरीक्षण और आत्म-शुद्धि की प्रक्रिया है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
जैन दर्शन में प्रतिक्रमण का अत्यधिक महत्व है। प्रतिक्रमण का अर्थ है आत्मनिरीक्षण करना, जिसमें व्यक्ति अपने विचारों, श
ब्दों और कार्यों का विश्लेषण करता है। अनजाने या जानबूझकर किए गए किसी भी गलत कार्य के लिए क्षमा याचना करता है और भविष्य में ऐसे कार्यों से दूरी बनाए रखने का संकल्प लेता है। आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के परम भक्त श्रावक अनूप भंडारी ने बताया कि प्रतिक्रमण की नियमित साधना से कर्मों का क्षय होता है और आत्मा आध्यात्मिक मार्ग पर स्थिर रहती है। प्रत्येक श्रावक को प्रतिदिन, साप्ताहिक या मासिक रूप से प्रतिक्रमण करना चाहिए।
प्रतिक्रमण का प्रारूप में निम्न मंत्र एवं प्रार्थनाएँ शामिल हैं:
• ॐ नमः सिद्धेभ्यः (तीन बार)
• पंच परमेष्ठियों, चौबीस तीर्थंकरों और अन्य संतों को मन वचन काया से बारम्बार वंदना
• स्वयं के द्वारा किए गए अपराध, भूल, अवज्ञा, अनादर आदि के लिए बारम्बार क्षमा याचना
• सभी जीवों के प्रति क्षमा भाव और सुगति प्राप्ति की प्रार्थना
• णमोकार मंत्र का नौ बार जाप
श्रावक अनूप भंडारी ने सभी जैन अनुयायियों से प्रतिक्रमण की नियमित साधना करने और आत्म-शुद्धि के मार्ग पर अग्रसर होने का आह्वान किया।













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