कुंद-कुंद ज्ञानपीठ, इंदौर की राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम सत्र में प्राकृत वाङ्मय, जैन आगम, योग, ध्यान, पर्यावरण और ज्योतिष जैसे विषयों पर विद्वानों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। सत्र को पूज्य सागर जी महाराज का पावन सानिध्य प्राप्त हुआ। पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज़ की विशेष रिपोर्ट….
“ज्ञान की विरासत को समझने और सँजोने का सार्थक प्रयास — प्राकृत विद्या पर विद्वानों का चिंतन”
इंदौर। कुंद-कुंद ज्ञानपीठ, इंदौर की ओर से आयोजित द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “प्राकृत वाङ्मय एवं सिरि भूवलय के परिप्रेक्ष्य में भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयाम” के अंतर्गत शनिवार को प्रथम सत्र में शोधपत्रों का वाचन किया गया। इस सत्र में जैन आगम, प्राकृत साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध पहलुओं पर गहन और तथ्यपूर्ण मंथन हुआ। सत्र को अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज का पावन सानिध्य प्राप्त हुआ।
प्राकृत और पर्यावरण पर विचार
प्रथम वक्ता भरत जैन शास्त्री ने प्राकृत वाङ्मय में पर्यावरण संरक्षण विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राकृत भाषा में जीवन की हर परंपरा समाहित है। उन्होंने बताया कि प्राचीन ग्रंथों में प्रकृति संरक्षण का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
जैन आगम और ज्योतिष की अवधारणा
इसके पश्चात दमोह स्थित एकलव्य विश्वविद्यालय के डॉ. आशीष जैन ने जैन आगम में ज्योतिष की अवधारणा और उसके प्रभाव विषय पर अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए और बताया कि आगमिक साहित्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
योग, ध्यान और आध्यात्मिक चेतना
डॉ. सरिता जैन दोसी ने प्राकृत आगम एवं जैन साहित्य में योग और ध्यान विषय पर प्रकाश डालते हुए इसकी आध्यात्मिक महत्ता को रेखांकित किया। वहीं डॉ. समता अनुराग जैन एवं डॉ. शोभा जैन ने भी अपने शोधपत्रों का वाचन कर सत्र को अकादमिक दृष्टि से समृद्ध किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन और प्रश्नकाल
सत्र की अध्यक्षता उज्जैन स्थित महर्षि पाणिनि विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर शिवशंकर मिश्रा ने की। उन्होंने सभी शोधपत्रों की समीक्षात्मक प्रस्तुति देते हुए वक्ताओं की विद्वत्ता की सराहना की। प्रश्नकाल का संचालन डॉ. जयकुमार उपाध्ये ने किया, जिसमें विद्वानों और शोधार्थियों के बीच सार्थक संवाद हुआ।
सम्मान और संचालन
इस अवसर पर अतिथियों का सम्मान ट्रस्ट अध्यक्ष अमित कासलीवाल, हेमंत पाटनी एवं अरविंद जैन द्वारा किया गया। सत्र का कुशल और प्रभावी प्रोफेसर डॉ. संगीता मेहता ने किया।
“प्राकृत की धरोहर आज भी बोल रही है — बस सुनने वाली दृष्टि चाहिए”













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