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जल संरक्षण, वास्तु और लिपियों पर ज्ञान का उजास : राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में प्राचीन पांडुलिपियों की ऐतिहासिकता पर हुआ सार्थक मंथन


कुंदकुंद ज्ञानपीठ इंदौर की राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में जल संरक्षण, प्राचीन लिपियों और पांडुलिपियों की ऐतिहासिकता पर विद्वानों ने गहन मंथन किया। सत्र ने भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक दृष्टि को उजागर किया। पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज़ की विशेष रिपोर्ट 


जब अतीत बोलता है, तो भविष्य को दिशा मिलती है…

इंदौर शहर में शनिवार का दिन ज्ञान, बौद्धिकता और ऐतिहासिक जानकारियों से ओतप्रोत रहा। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम दिन के द्वितीय सत्र में श्रोताओं को भारत की प्राचीन वैज्ञानिक सोच से रूबरू होने का अवसर मिला।

प्राचीन जल संरक्षण की वैज्ञानिक सोच

सत्र में वक्ता डॉ. मनीष रॉय ने भारत की प्राचीन जल संरचनाओं, बावड़ियों, तालाबों और उनके संरक्षण की पद्धतियों पर बिंदुवार विवेचन किया। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत में जल संरक्षण केवल आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का हिस्सा था।

शारदा और ब्राह्मी लिपि ने मोहा सदन

डॉ. राकेश कॉल ने शारदा लिपि और ब्राह्मी लिपि पर तथ्यात्मक और प्रभावशाली प्रस्तुति दी। उन्होंने शारदा लिपि के विकास, उसके ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान में चल रहे शोध कार्यों की जानकारी दी, जिससे पूरा सदन मंत्रमुग्ध हो गया।

लिपियां और भाषा का गहरा संबंध

डॉ. शशिकुमार शर्मा ने भाषा और लिपियों के संबंध को उदाहरणों के साथ सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने संक्षिप्त लेकिन समग्र उद्बोधन में बताया कि लिपियां केवल लेखन का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति की संवाहक होती हैं।

पांडुलिपियों की ऐतिहासिकता पर विमर्श

जयपुर से पधारी डॉ. रमानी स्वर्णा ने प्राचीन पांडुलिपियों की ऐतिहासिकता पर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। वहीं डॉ. ऋषभ जैन फौजदार ने भी सारगर्भित उद्बोधन देकर सत्र को और समृद्ध किया।

सत्र का कुशल संचालन

द्वितीय सत्र का कुशल और प्रभावशाली संचालन डॉ. समता मारोरा ने किया, जिससे पूरा सत्र अनुशासित और रोचक बना रहा।

गणमान्य जनों की उपस्थिति

कार्यक्रम में जयकुमार उपाध्ये, सुरेश कासलीवाल, ट्रस्ट अध्यक्ष अमित कासलीवाल, धीरेंद्र कासलीवाल, मुकेश पाटोदी, हसमुख गांधी, दिलीप पाटनी, अरविंद जैन, रेखा संजय जैन, संजय पापड़ीवाल, नीलेश के शास्त्री सहित बड़ी संख्या में सुधिजन उपस्थित रहे।

प्राचीन ज्ञान की यह विरासत आज भी हमें सिखाती है—संरक्षण ही सृजन की पहली सीढ़ी है।

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