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पूजा की हर पंक्ति में है जीवन का रहस्य

जीवन और पूजन

 

हर धर्म में पूजा की अलग-अलग पद्धतियां और तरीके हैं और पूजा-अर्चना के उद्देष्य भी अलग-अलग हैं। जैन धर्म की पूजन पद्धति त्याग आधारित है, जो व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया से दूर करते हुए मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करती है। जैन पूजन की पंक्तियों का व्यक्ति के जीवन से गहरा संबंध है, अगर पूजा की पंक्तियों पर सम्यक दृष्टि डाली जाए तो वे जीवन के रहस्यों को सहज रूप से प्रकट करती हैं।
आचार्य विद्यासागर महाराज ने अपने इंदौर प्रवास के दौरान पूजन की पक्तियों के महत्व को इंगित करते हुए कहा कि पूजन में जो पंक्तियां दी गई हैं और हम जिस उद्देश्य को लेकर अष्ट मंगल द्रव्य पूजन में अर्पित करते हैं, उस ओर थोड़ी दृष्टि डालनी चाहिए। हम क्षुधा रोग के निवारण के लिए नैवेद्य चढ़ातेे हैं। यह क्यों और कहां चढ़ाया जा रहा है, यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है। नैवेद्य एक प्रकार से विषय है, क्योंकि जो हम भोजन में लेते हैं, वही पूजन में काम में लेते हैं। वही लड्डू भोजन में भी है और पूजन में भी है। यह क्षुधारोग निवारण के लिए चढ़ाया जा रहा है, लेकिन जिन्होंने क्षुधा को निवारित कर दिया, उनके लिए यह नहीं चढ़ाया जा रहा है और ना ही स्वयं के लिए चढ़ाया जा रहा है। चढ़ाने का लक्ष्य क्षुधा रोग के लिए है। हम सब रोगी हैं, भगवान निरोगी हैं। कोई सेठ साहूकार यह समझे कि वह तो चार-पांच बार खाते हैं, क्योंकि उनके पास कोई कमी नहीं है तो मान लीजिए वह चार गुना रोगी हो रहे हैं और महारोग की ओर जा रहे हैं।
आचार्यश्री कहते हैं कि जोे व्यक्ति दीपक में तेल जितना भोजन करे, उसका पूजन करना सार्थक माना जाएगा। ऐसे पूजन पढ़ने का कोई अर्थ नहीं, जिसमें रस ही नहीं निकले। गीत के रहस्य कोे स्पष्ट करने वाले वाला पूजन, विधान और पंचकल्याणकों में होने चाहिए, ताकि सुनने वाले उसमें भीग जाएं।
पूजन करते समय यह विचार करें कि हे भगवान आप तो क्षुधा को जीत चुके हैं। हम भी इसका निवारण कर पाएं। हमारे भगवान 18 दोषों से रहित हैं और हम दोषों के पुंज हैं, इसलिए हे भगवन मैं आपको साक्षी मान कर जो भी भोजन लेता हूं, वह शरीर को चलाने के लिए है। जैसे दीपक को चलाने के लिए तेल जरूरी है, उसी प्रकार और उतना ही शुद्ध भोजन मैं ले रहा हूं और आपके चरणों में जो नैवेद्य चढ़ा रहा हूं वह इसीलिए कि मेरे रोग का निवारण हो। भाोजन करना ही एक रोग है। कई बार करना तो और बड़ा रोग है। फिर भी खाते रहते हैं, इसलिए पूजन को सावधानी से पढ़ो और अर्थ सहित पढ़ो तो गद्गद् हो जाओगे।
आचार्यश्री का यह संदेष हमारे जीवन को अर्थ प्रदान करने के साथ ही हमारी जीवन शैली को नई दिषा प्रदान करता है।

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