अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के आठवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में अर्घ्य चढ़ाए गए। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि श्रावक के 6 आवश्यक कर्तव्य होते हैं देव पूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, तप, त्याग और दान। जो इन छह आवश्यक कर्तव्यों को करता है वह श्रावक की श्रेणी में आता है और जो नहीं करता है वह श्रावक कहलाने के लायक भी नहीं होता है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के आठवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में 280 अर्घ्य चढ़ाए गए। सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान के अभिषेक व शांति धारा का सौभाग्य आज के भक्तामर महामंडल विधान के पुण्यार्जक राकेश कविता सार्थक जैन, सूरजमल पाटनी को प्राप्त हुआ।
तत्पश्चात नित्य नियम पूजन के साथ भक्तामर महामंडल विधान में आज कुल 29 काव्यों के साथ 1624 अर्घ्य समर्पित किए गए। आचार्य अभिनंदन महाराज के चित्र अनावरणकर्ता व दीप प्रज्वलनकर्ता राकेश कविता सार्थक जैन रहे। अंतर्मुखी परम पूज्य मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के पाद पक्षालन व शास्त्र भेंट का सौभाग्य सुशीला, रेखा कोटिया परिवार और राकेश, कविता, सार्थक जैन परिवार को प्राप्त हुआ।
मनुष्य गति के छह आवश्यक कर्तव्य
इस अवसर पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि श्रावक के 6 आवश्यक कर्तव्य होते हैं देव पूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, तप, त्याग और दान। जो इन छह आवश्यक कर्तव्यों को करता है वह श्रावक की श्रेणी में आता है और जो नहीं करता है वह श्रावक कहलाने के लायक भी नहीं होता है।
आचार्य भगवंत कहते हैं कि मनुष्य को मनुष्य पर्याय तो मिल गई है लेकिन वह अपने कर्तव्यों को पूरा करने में असमर्थ रहता है। यह छह आवश्यक कर्तव्य सिर्फ मनुष्य गति में ही होते हैं तिर्यंच, नारकीय देव इस पात्रता में नहीं आते हैं।
मनुष्य पर्याय में रहते हुए हम अनुशासन में नहीं रह रहे हैं। अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर पा रहे हैं, तो यह पर्याय हमसे अगले भव में छूट जाएगी। आज हमारा भोजन भी तिर्यंच जैसा हो गया है। मनुष्य का भोजन सात्विक होता है और सात्विक भोजन अगर वह नियम से खाता है तो वह हमेशा स्वस्थ रहेगा।
आचार्य भगवंत कहते हैं कि मनुष्य का ना सोने का समय होता है, ना खाने का और ना ही पहनने का ढंग इन सारी ही स्थितियों में वह तिर्यंच जैसी स्थिति को पैदा कर रहा है। हमें मनुष्य जैसी अच्छी पर्याय मिली है तो खोटे कर्म हम क्यों कर रहे हैं जिनेंद्र भगवान की भक्ति, पूजा, उपासना करके हम हमारे इस भव को सुधार सकते हैं।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार से हम हमारे घरों में भगवान को एक कोने में टांग देते हैं उसी तरह से आज हमारे बच्चे धर्म का ज्ञान ना लेते हुए पाश्चात्य संस्कृति को अपना रहे हैं। जब महाराजजी आए, पयुर्षण पर्व आए तो धोती पहन ली।
विचार करना यह भाव यह परिणाम आपके घर में संस्कार और संस्कृति को जन्म देंगे क्या आज हमने अपने घरों में भगवान को एक कोने में रख दिया है और अपने मन में भी भगवान को एक कोने में जगह दी है बाकी पूरा मन वासनाएं, राक्षस और तिर्यंच जैसे भावों से भरा हुआ है।
आज हमें अपने बच्चों से भी काम करवाना रहता है तो हम उन्हें लालच देते हैं तो बताएं आप अपने बच्चों से धर्म करवा रहे हैं या व्यापार करवा रहे हैं। आपने एक इंसान को तो जन्म दे दिया है लेकिन अगर उसकी इंसानियत को बनाए रखना है तो बचपन से ही उसमें संस्कार और संस्कृति के बीज का रोपण करें और बचपन से उसमें यह संस्कार दे वह सुबह उठकर मंदिर जरूर जाए तब आप देखना की आपका घर ही स्वर्ग बन जाएगा और आपको कहीं और जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।













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