जैन समाज के लिए यह बहुत अहम दिन और अवसर है कि 9 जनवरी पौष शुक्ल दशमी को जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ का ज्ञान कल्याण मनाया जा रहा है। इंदौर नगर सहित देश के विभिन्न क्षेत्र में भगवान शांतिनाथ के अनेकों मंदिर हैं। जहां श्रावक-श्राविकाएं अपनी भक्ति और श्रद्धा प्रकट करती हैं। इस विशेष मौके पर श्रीफल जैन न्यूज लेकर आया है भगवान शांतिनाथ से जुड़ी धर्म परायण जानकारी। पढ़िए इंदौर श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह रिपोर्ट…
इंदौर। जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ का 9 जनवरी पौष शुक्ल दशमी को ज्ञान कल्याणक है। इस खास अवसर पर भगवान शांतिनाथ के जन्म और उनके जीवन से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी से यहां अवगत करवाया जा रहा है। जैन धर्म में सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ का स्थान सर्वोच्च शिखर पर है। भगवान शांतिनाथ के मंदिरों में जैन भक्तों की अनन्य भक्ति की प्रवाहना दिखाई देती है। जैन धर्म के ग्रंथों में वर्णित है कि भगवान शांतिनाथ पांचवें चक्रवर्ती राजा और बारहवें कामदेव थे। वे शांति, अहिंसा, करुणा और अनुशासन के शिक्षक थे। जाति स्मरण से और दर्पण में अपने मुख के दो प्रतिबिंब देखकर उन्हें वैराग्य हुआ था। वैराग्य के बाद उन्होंने ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी को आम्रवन में दीक्षा ग्रहण की थी। जैन ग्रंथों के अनुसार स्वर्ग में अपनी आयु पूर्ण करने के बाद भगवान शांतिनाथ का जन्म भरत क्षेत्र की हस्तिनापुर नगरी में राजा विश्वसेन और रानी अचिरा के यहां हुआ। राजा विश्वसेन और रानी अचिरा बेहतर शासन चला रहे थे। वे अत्यंत धर्म परायण और प्रेममय स्वभाव के थे।
गर्भ में आते ही देवलोक में छाया उल्लास
जैसे ही तीर्थंकर भगवान रानी अचिरा के गर्भ में अवतरित हुए। देवलोक में हर्षोल्लास छा गया। संपूर्ण विश्व में आनंद हो गया। भगवान के गर्भ में आने से पहले राजा विश्वसेन के राज्य में प्लेग और अन्य बीमारियों की महामारी फैली हुई थी। इस महामारी पर किसी का नियंत्रण नहीं था। जब तीर्थंकर गर्भ में आते हैं, तो पूरी दुनिया का माहौल बदल जाता है। फिर भयंकर महामारी भी अपने आप खत्म हो जाती है। भगवान शांतिनाथ के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। जैसे ही शांतिनाथ भगवान ने रानी अचिरा के गर्भ में प्रवेश किया। पूरे राज्य में फैली महामारी अचानक अपने आप खत्म हो गई और शांति छा गई। इसलिए राजा विश्वसेन ने अपने बेटे का नाम ‘शांतिनाथ’ रखा।
भगवान शांतिनाथ का बचपन, विवाह और दीक्षा
भगवान शांतिनाथ का पालन-पोषण बहुत प्यार और देखभाल से हुआ। उनमें सभी प्रकार के कौशल और संस्कार भी थे। जब वे युवा हुए तो माता-पिता ने विवाह करने का दबाव डाला। राजकुमार शांतिनाथ का विवाह राजकुमारी यशोमती से हुआ। राजकुमारी यशोमती ने उनके बेटे को जन्म दिया और उसका नाम चक्रायुध रखा गया। जो रानी अभिनंदिता की आत्मा और राजा श्रीसेन (भगवान शांतिनाथ के ग्यारह पिछले जन्मों में से पहला जन्म) की पत्नी थी। अपने पिछले जन्म में चक्रायुध राजा मेघराथ के बेटे राजकुमार द्रध्रथ थे। ये दोनों आत्माएं लगातार 12 जन्मों से एक साथ थीं और अंतिम जन्म में वह आत्मा भगवान शांतिनाथ के बेटे चक्रायुध के रूप में पैदा हुई। इस तरह हमारे करीबी रिश्तेदार भी हमारे कर्म बंधन के परिणामस्वरूप ही हमारे जीवन में आए हैं।
भगवान शांतिनाथ 14 रत्न प्राप्त कर बने चक्रवर्ती
राजा विश्वसेन ने राजकुमार शांतिनाथ को राजगद्दी सौंप दी। राजा शांतिनाथ ने पूरी दुनिया को जीत लिया और चौदह रत्न प्राप्त करके पांचवें चक्रवर्ती बन गए। वे एक ही जन्म में चक्रवर्ती और तीर्थंकर दोनों बन गए। कई वर्षों तक चक्रवर्ती के रूप में राज करने के बाद लोकांतिक देवों के अनुरोध पर भगवान शांतिनाथ ने दीक्षा लेने का निर्णय लिया तथा एक वर्ष तक भारी दान (वर्षिदान) किया। दीक्षा के एक वर्ष बाद भगवान शांतिनाथ को केवल ज्ञान हुआ।
हजारों साधु-साध्वियों के साथ मोक्ष की ओर गए
श्री शांतिनाथ भगवान के पुत्र चक्रायुध उनके प्रथम गणधर (तीर्थंकर के मुख्य शिष्य) थे। भगवान के कुल 36 गणधर थे। भगवान शांतिनाथ हजारों साधु-साध्वियों के साथ शिखरजी पर्वत से मोक्ष की ओर गए।
भगवान शांतिनाथ की जीवदया
भगवान शांतिनाथ ने भी अहिंसा के संदेश को प्रमुखता से विस्तार दिया। यह उनके पूर्व जन्म से जुड़ी एक घटना से स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। अपने दसवें अवतार में भगवान शांतिनाथ ने राजा मेघरथ के रूप में जन्म लिया। राजा मेघरथ के जीवन में करुणा की एक अत्यंत सुंदर घटना घटी। उनकी करुणा ऐसी थी कि सारा संसार उनका वंदन करने लगा। एक बार राजा मेघरथ अपने महल में बैठे हुए थे, तभी अचानक एक भयभीत कबूतर उड़ता हुआ आया। उसके पीछे एक बड़ा बाज था। अचानक वह कबूतर राजा मेघरथ की गोद में जा गिरा। तुरंत ही, मानो मनुष्य की भाषा में बात कर रहा हो, भयभीत स्वर में उसने राजा मेघरथ से कहा, ‘मेरी रक्षा करें, यह बाज मुझे मारना चाहता है।’ राजा मेघरथ स्वभाव से बहुत दयालु थे। इसके अलावा वे एक क्षत्रिय भी थे, जिनका जन्मजात गुण था कि वे अपनी शरण में आए किसी भी व्यक्ति की रक्षा करते हैं। राजा मेघरथ ने कबूतर को अभयदान दिया और आश्वासन भी दिया, ‘मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर बचाऊंगा।’ उधर, बाज वहां आया और राजा से बोला, ‘तुमने मेरा शिकार क्यों छीन लिया? मुझे बहुत भूख लगी है।’ राजा मेघरथ ने बाज से कुछ और खाने का अनुरोध किया और कहा कि किसी जीव को मारने से कर्म का बंधन होता है जो सीधे नरक में ले जाता है। उन्होंने यह भी कहा, ‘यह कबूतर तुमसे बहुत डरता है। तुम जो चाहो, मैं तुम्हें दे दूंगा, लेकिन तुम किसी जीव को मत खाना। यह कबूतर मेरी शरण में आया है।’ सबसे बड़ी अहिंसा किसी भी जीव को न खाने में है। एकेंद्रिय वाले जीव को ही खाने की अनुमति है, उसके अलावा दोेद्रिंय वाले जीव को नहीं खाया जा सकता, क्योंकि ये सभी जीव त्रस जीव माने गए हैं। त्रस जीव का अर्थ है, जो हमें देखकर परेशान हो जाए और जान बचाकर भाग जाए। राजा मेघरथ ने बाज को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं माना, बल्कि जिद पर अड़ा रहा। ‘मैं केवल मांसाहारी भोजन ही खाता हूं’ अंत में राजा मेघरथ ने कहा, ‘ठीक है, यदि तुम केवल मांसाहारी भोजन ही खाना चाहते हो, तो मैं तुम्हें इसके बदले में अपना मांस देता हूं, इससे अपना पेट भर लो, लेकिन कबूतर को छोड़ दो।’ बाज राजा की बात मान गया।
राजा ने तराजू मंगवाया। एक पर कबूतर को रखा और दूसरे पर अपना मांस रखकर वजन नापने लगा। राजा अपना मांस रखता गया लेकिन, कबूतर का पलड़ा ऊपर नहीं उठा। इसलिए तराजू बराबर नहीं हो रहा था। अंत में राजा मेघरथ खुद पलड़े पर बैठ गए। यह देखकर उनके परिवार के सभी सदस्य, दरबारी, मंत्री और राज्य के सभी लोग हैरान रह गए। उन्हें लगा कि यह बाज पक्षी जरूर कोई संदिग्ध प्राणी होगा। उन्होंने राजा से विनती की, ‘आप यह क्या कर रहे हैं? इस एक संदिग्ध प्राणी के लिए आप हमें परेशान कर रहे हैं। आपका कर्तव्य राज्य की रक्षा करना है। अगर आप एक कबूतर के लिए अपनी जान दे देंगे, तो इस राज्य की देखभाल कौन करेगा?’ लेकिन राजा अपने फैसले पर अडिग रहे। वह पलड़े पर बैठ गए और उस छोटे कबूतर की जान बचाने के लिए अपनी जान देने को तैयार हो गए।
देव ने किया प्रणाम और प्रकट की श्रद्धा
तभी एक देव आया और राजा मेघरथ को प्रणाम किया। देव ने राजा मेघरथ के प्रति बड़ी श्रद्धा प्रकट की। उसने कहा, ‘मुझे क्षमा करें। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई है। मैं एक देव हूं’ पिछले जन्म के किसी प्रतिशोध के कारण जब बाज कबूतर के पीछे पड़ा था और उसके प्राण लेने को उद्यत था, तब मैं संदिग्ध रूप धारण करके इन दोनों पक्षियों के शरीर में प्रविष्ट होकर आपके पास आया था। जब स्वर्ग में आपकी दया और दयालुता की प्रशंसा होती थी, तो मुझे आपसे ईर्ष्या होती थी। देव कहते थे कि इस पृथ्वी पर जीवों के प्रति आपकी जितनी दया किसी में नहीं है। इसलिए मैंने आपकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। इसलिए मैं यहां आया और मेरे कारण आपको कष्ट उठाना पड़ा। मेरी इस परीक्षा में आप सफल हुए हैं।’ तब दोनों पक्षी उड़ गए और देव ने भी क्षमा मांगी और राजा की अनुमति लेकर वहां से चला गया। हमारे धर्मग्रंथों में राजा मेघराथ की जीवों के प्रति दया का असाधारण उदाहरण है।
जीवदया हर तीर्थंकर ने सिखाई और दया का महत्व बताया
तीर्थंकरों , ज्ञानियों और आचार्यों ने जीवों के प्रति दया के महत्व पर बहुत जोर दिया है। हमारे द्वारा किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए और न ही उसे मारना चाहिए। केवल स्थूल हिंसा ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म हिंसा, यानी विचारों से किसी को कष्ट पहुंचाना भी नहीं चाहिए। जो व्यक्ति मोक्ष जाना चाहता है, उसे इस संसार में किसी भी जीव को विचारों, वचनों या कर्मों से ज़रा भी कष्ट नहीं देना चाहिए। तभी वह मोक्ष (परम मुक्ति) का पात्र माना जाता है।
किसी भी जीव को दुःख न पहुंचे
परम पूज्य दादा भगवान ने भी ऐसा जीवन जिया कि उनके कारण किसी भी जीव को किंचित मात्र भी दुःख न पहुंचे। वे कहते थे कि हमें प्रतिदिन सुबह अपने अंतर्यामी भगवान से सच्चे मन से प्रार्थना करनी चाहिए और कहना चाहिए कि, मेरे मन, वचन और काय से किसी भी जीव को किंचित मात्र भी दुःख न पहुंचे। हृदय से पश्चाताप-प्रतिक्रमण करने से उस दोष से मुक्त होना संभव है।













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