फिलिपींस में आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में टीएमयू की पैरामेडिकल साइंसेज़ की तीन सीनियर फैकल्टी ने अपने-अपने विषयों पर दमदार व्याख्यान दिए। कॉन्फ्रेंस की थीम ग्लोबल साउथ की संस्कृति, मेमोरी और पहचान पर आधारित रही। रिपोर्टर – प्रो. श्याम सुंदर भाटिया
“ज्ञान का दम हो, तो दुनिया आपका मंच बन जाती है!”
तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद की पैरामेडिकल साइंसेज़ फैकल्टी ने फिलिपींस की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ऑफ फिलिपींस इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। कॉन्फ्रेंस की थीम थी— Forensics of the Forgotten: Uncovering Memory, Culture & Identity in the Global South.
तीन सीनियर फैकल्टी, तीन दमदार व्याख्यान
टीएमयू के तीन विशेषज्ञ—
प्रो. रूचि कांत,
श्री रवि कुमार,
श्री योगेश कुमार,
ने अपने-अपने क्षेत्र से जुड़े विषयों पर बेहद प्रभावशाली लेक्चर दिए।
प्रो. रूचि कांत: रेज़िलिएंस कैसे बनता है?
ऑनलाइन कॉन्फ्रेंस में प्रो. रूचि कांत ने बताया कि—
रेज़िलिएंस न्यूरोएंडोक्राइन, इम्यून और मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं से बनता है।
संकट के बाद कोर्टिसोल, सूजन और न्यूरोप्लास्टिसिटी पर असर पड़ता है।
लिंग व उम्र की भूमिका हार्मोनल बदलावों—एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरोन, मेनोपॉज, एंड्रोपॉज—से तय होती है।
उन्होंने कहा कि जैविक व सामाजिक तंत्र मजबूत हों तो रिकवरी तेज होती है।
श्री रवि कुमार: फॉरेंसिक साइंस में क्या कमी?
अपने सत्र में रवि कुमार ने स्पष्ट किया कि—
फॉरेंसिक शिक्षा में बड़े गैप हैं।
कैपेसिटी बिल्डिंग की सख्त जरूरत है।
उन्होंने यह भी समझाया कि कैसे—
AI,
नैनोटेक्नोलॉजी,
वर्चुअल ऑटोप्सी,
3D इमेजिंग,
एथिक्स और करिकुलम मॉडर्नाइजेशन
फॉरेंसिक साइंस का भविष्य बदल रहे हैं।
श्री योगेश कुमार: मृत्यु के बाद शरीर में क्या होता है?
योगेश कुमार ने फॉरेंसिक टैफोनॉमी पर रोचक जानकारी दी—
मृत्यु के बाद शरीर पर पौधों, मिट्टी, मौसम और जीव-जंतुओं का गहरा प्रभाव पड़ता है।
कीड़ों जैसे ब्लो फ्लाई के लार्वा का जीवन-चक्र देखकर मृत्यु का समय समझा जा सकता है।
उन्होंने बताया कि एंटोमोलॉजी फॉरेंसिक जांच का मजबूत आधार है।
“ज्ञान का सफर सीमाओं से नहीं, हौसलों से तय होता है!”













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