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धर्मचर्चा : आत्मा की अमूढ़ता वंदनीय आर्यिका मां 105 श्री विज्ञानमती माताजी     


उदयनगर कॉलोनी स्थित चंदा प्रभु जिनालय में विज्ञानमती माताजी संसघ के चातुर्मास दौरान धर्मचर्चा और प्रतिदिन क्लास रूपी प्रवचन के माध्यम से माता जी ने बताया की अमूढ़ आत्मा इन सबको अपना मानता है ये मेरा घर है,ये मेरा धन है,ये मेरी स्त्री है| | पढ़िए यह राजीव सिंघई मोनू की विशेष रिपोर्ट श्रीफल जैन न्यूज़ के साथ…


इंदौर | उदयनगर कॉलोनी स्थित चंदा प्रभु जिनालय में विज्ञानमती माताजी संसघ के चातुर्मास दौरान धर्मचर्चा और प्रतिदिन क्लास रूपी प्रवचन के माध्यम से माता जी ने बताया शरीर,धन,घर,स्त्री,पुत्र,मित्र, शत्रु…ये सब हमारे से सर्वथा भिन्न हैं फिर भी ये अमूढ़ आत्मा इन सबको अपना मानता है ये मेरा घर है,ये मेरा धन है,ये मेरी स्त्री है…और इनके वियोग होने पर दुखी होता है। यही आत्मा की अमूढ़ता है।

वृक्ष और पक्षी

अलग अलग देशों से, दिशाओं से पक्षी आकर के एक वृक्ष पर रहते हैं…फिर जिनको जिस दिशा में जाना होता है..वहां गमन कर जाते हैं उसी प्रकार हमारे यहां पर भी परिवार रूपी वृक्ष है उस पर…क्या पता नरक से आया..तिर्यंंच से आया…और आकर हमारे वृक्ष पर बैठ गया…कब तक बैठा रहेगा जब तक उसके कार्य की सिद्धी नहीं हो जाती…जैसे ही कार्य की सिद्धी होगी वृक्ष से चला जाएगा.. कोई नियम नहीं है…60 वर्ष तक रहेगा,60 महीने या 60 दिन रहेगा…कभी वृक्ष से चला जाएगा.. कोई आश्चर्य नहीं है.. कोई बदला लेने के लिए हमारे वृक्ष पर आ सकता है कोई प्रेम देकर चला जाएगा… किसीका जवान बेटा मर गया.. पहले प्रेम बढ़ाया.. लाड़ला बना,सबसे प्यारा था..उसको रुलाना था.. रुलाकर चला गया..पूर्व भव में आपने रुलाया होगा..अब वो रुला गया।

बुरे के साथ भी अच्छा करो

जैसा तुमने किसी के साथ किया है वैसा तुम्हारे साथ भी होगा,अच्छा किया तो अच्छा होगा,बुरा किया तो बुरा होगा..आज भले ही आपने आम का पेड़ (पुण्य) लगाया लेकिन अगर आपके आंगन में कांटे (दुःख) हैं वो इस बात का प्रमाण है कि आपने निश्चित ही पूर्व में बबूल का बीज (पाप) बोया था।

महाराज जरूर बनेंगे

तुम सबको महाराज बनना है कि नहीं…अरे हां तो बोल दिया करो… हां बनना है भले ही 80 साल में बनें या 90 साल में लेकिन बनेंगे जरूर.. कोई कितना ही गरीब हो उससे करोड़पति बनने का पूछेंगे तो वो मना कर देगा क्या…अभी भले ही हैसियत नहीं है लेकिन कभी तो बनेंगे… भावना भाते रहो कि हम भी महाराज बनेंगे… कम से कम अभी से ये संकल्प कर लो कि इतने साल बाद घर का त्याग कर देंगे।

इस प्रकार सब अपने अपने कार्य के वश होकर के आते हैं और कार्य करके अपने अपने देशों को चले जाते हैं इसलिए कोई अपने वृक्ष (घर) से चला जाए तो आर्त ध्यान नहीं करना.. जो आया है सो जाएगा। मारने वाले के लिए तू गुस्सा क्यों करता है मारने वाला तो स्वयं मारा जाएगा। सामने वाले ने कितना ही बुरा किया हो मैं उसका बुरा नहीं करूंगा… बुरा करना उसका काम है..मैं उसका काम क्यूं करूं? बुरा करना मुझे अच्छा नहीं लगता…उसने अंगारे फेंके हैं तो उसका हाथ जलेगा…उसने दुख दिया है तो उसको दुःख मिलेगा…मुझे उसे दुःख नहीं देना है।पारसनाथ ने कमठ का कभी बुरा नहीं किया और कमठ हमेशा बुरा करता रहा…अंत में किसका बुरा हुआ।अपन लोग तो कमठ के भक्त हैं…नहीं नहीं भक्त तो पारसनाथ के हैं लेकिन…काम हम पारसनाथ जैसा कार्य करें…नहीं कर सकते हैं तो कोई बात नहीं… कम से कम कमठ जैसे कार्य ना करें।

व्रत लिए बगैर संलेखना हो सकती है क्या?

व्रत कितने दिन के लिए धारण करना जरूरी है….व्रत धारण किए बगैर सम्यग्दृष्टी की संलेखना होती है,क्या तकलीफ है,व्रत धारण करना अनिवार्य नहीं है…घर में रहकर भी अच्छी संलेखना हो सकती है…अगर उसको विधि आए तो। व्रत लेना चाहिए बहुत अच्छी बात है…और बहुत स्थिरता के साथ में व्रतों का पालन करना चाहिए।

मांसाहार

कल एक ठाकुर महिला आई थी उसने बताया कि उसकी दादी ने 10 साल की उम्र में मांसाहार का,व्यसन का त्याग करवा दिया था 15 साल की उम्र में उसकी शादी हो गई…ससुराल में ये सब चलता था…उसकी सासू ने मांस खाने व बनाकर खिलाने के लिए लातें तक मारी लेकिन वो अपने नियम से नहीं डिगी…घर भी नहीं छोड़ा और न स्वयं खाया न अपने पति को खाने दिया। इसे कहते हैं रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई ऐसा करना चाहिए,ऐसा करके प्रतिमा लेने वाले की अवश्य समाधि होगी लेकिन जो प्रतिमा नहीं ले पा रहा है वो भी अंत समय में….आजकल तो ऐसी ऐसी बीमारियां हो रही हैं…डॉक्टर पहले ही बता देता है… ऐसे में आदमी स्वतंत्रता पूर्वक समाधि ले सकता है लेकिन वेदना को सहन करना और घर वालों का माहौल नहीं बनता…करने वाले कर भी रहे हैं..दृढ़तापूर्वक करना ही चाहिए। जैन कुल में आने के बाद भी हम मिलावट के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से मांसाहार का सेवन कर रहे हैं दवाई हो या बाजार की अन्य वस्तु…देखकर, पढ़कर,समझ कर सेवन करो।

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