राजस्थान के जैन संतों ने अपने गुरुओं की कीर्ति का खूब बखान किया है। राजस्थान की धरती पर जैन संतों की स्थापित परंपरा में कई संतों ने अपने लेखन के माध्यम से जैन धर्म को पोषित और पल्लवित किया है। धर्म के प्रति जनजागरण तो वे अपने प्रवचनों में करते ही थे, लेकिन अपनी रचनाओं में जैन गुरुओं के चरित्र को भी बखूबी उकेरा गया। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 28वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का ब्रह्म जयराज के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
इंदौर। राजस्थान में जैन संतों ने बहुत धर्म जागरण किया है। यहां पर उन्होंने साहित्य भी खूब रचा। साथ ही समीपवर्ती राज्यों गुजरात, पंजाब दिल्ली आदि राज्यों में विहार कर धर्म ध्वजा को फहराया। यहां जैन संतों की लंबी सूची है, लेकिन आज हम ब्रह्म जयराज के बारे में जानते हैं। ब्रह्म जयराज जी भट्टारक सुमतिकीर्ति के प्रशिष्य एवं भट्टारक गुणकीर्ति के शिष्य थे। संवत 1632 में भट्टारक गुणकीर्ति का पट्टाभिषेक डूंगरपुर नगर में बड़े उत्साह के साथ किया गया था। गुरु छंद में इसी का वर्णन किया गया है। इनके पट्टाभिषेक में देश के सभी प्रांतों से श्रावकगण शामिल हुए थे, क्योंकि उस समय भट्टारक सुमतिकीर्ति का देश में अच्छा सम्मान था। ब्रह्म जयराज ने अपने गुरु भट्टारक गुणकीर्ति की महिमा का गुणगान अपने छंदो में किया है। देखिए इन छंदों में उन्होंने कितने सुंदर तरीके से वर्णन किया।
संवत सोल बत्रीसमि, वैशाख कृष्णा सुपक्ष।
दशमी सुर गुरु जाणिए,लगन लक्ष सुभ दक्ष।
सिंहांसणरूपा तणि विसारया गुरु संत
श्री सुमति कीर्ति सूरि रिगं भरी, ढाल्या कुभं महंत।
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श्री गुण कीर्ति यतींद्र चरण सेवि नर नारि,
श्री गुणकीर्ति यतींद्र पाप तापादिक हारी।
श्री गुणकीर्ति यतींद्र ज्ञानदानादिक दायक,
श्री गुणकीर्ति यतींद्र चार संघाष्टक नायक।
स्ंकल यतीश्वर मंडणो, श्रीसुमति कीर्ति पट्टोधरण।
ज्यराज ब्रह्म एवं वदति श्री सकलसंघ मंगलकरण।













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