श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान गणिनी आर्यिका सरस्वती माताजी के ससंघ सानिध्य में रक्षाबंधन पर्व एवं श्रेयांस नाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। नगर में विराजमान आर्यिका सरस्वती माताजी के सानिध्य में बड़ा मंदिर जी में प्रातः सर्वप्रथम श्रीजी का पंचामृत अभिषेक शांति धारा कर सामूहिक पूजन किया गया, साथ ही ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांस नाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक पर लाड़ू चढ़ाया गया। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
सनावद। श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में विराजमान गणिनी आर्यिका सरस्वती माताजी के ससंघ सानिध्य में रक्षाबंधन पर्व एवं श्रेयांस नाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। नगर में विराजमान आर्यिका सरस्वती माताजी के सानिध्य में बड़ा मंदिर जी में प्रातः सर्वप्रथम श्रीजी का पंचामृत अभिषेक शांति धारा कर सामूहिक पूजन किया गया, साथ ही ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांस नाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक पर लाड़ू चढ़ाया गया। इस अवसर पर शांति धारा करने का सौभाग्य पवन कुमार, हर्षित जैन परिवार एवं राजकुमारी मूलचंद जैन परिवार को प्राप्त हुआ। श्रेयांस नाथ भगवान को मोक्ष कल्याणक का लाडू चढ़ाने का सौभाग्य सभी समाजजनों को प्राप्त हुआ।
सुनाई रक्षाबंधन की कथा
सन्मति जैन काका ने बताया कि इस पावन अवसर पर माताजी ने रक्षाबंधन की कथा सुनाते हुए कहा कि जैन पौराणिक ग्रंथों के अनुसार उज्जयिनी में श्री धर्म नाम के राजा के चार मंत्री थे बलि, बृहस्पति, नमुचि और प्रह्लाद। ये चारों मंत्री जैन धर्म के घोर विरोधी थे। इन मंत्रियों ने शास्त्रार्थ में पराजित होने के कारण जैन संत श्रुतसागर मुनिराज पर तलवार से प्रहार का प्रयास किया तो राजा ने उन्हें देश से निकाल दिया। चारों मंत्री अपमानित होकर हस्तिनापुर के राजा पद्म की शरण में आए। कुछ समय बाद मुनि अकंपनाचार्य 700 मुनि शिष्यों के संग हस्तिनापुर पहुंचे। बलि को अपने अपमान का बदला लेने का विचार आया। उसने राजा से वरदान के रूप में सात दिन के लिए राज्य मांग लिया।
राज्य पाते ही बलि ने मुनि तथा आचार्य के साधना स्थल के चारों तरफ आग लगवा दी। धुएं और ताप से ध्यानस्थ मुनियों को अपार कष्ट होने लगाए पर मुनियों ने अपना धैर्य नहीं तोड़ा। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक यह कष्ट दूर नहीं होगा, तब तक वे अन्ना-जल का त्याग रखेंगे। वह दिन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का दिन था। मुनियों पर संकट जानकर मुनिराज विष्णु कुमार ने वामन का वेश धारण किया और बलि के यज्ञ में भिक्षा मांगने पहुंच गए। उन्होंने बलि से तीन पग धरती मांगी। बलि ने दान की हामी भर दी तो विष्णु कुमार ने योग बल से शरीर को बहुत अधिक बढ़ा लिया। उन्होंने अपना एक पग सुमेरु पर्वत पर दूसरा पग मानुषोत्तर पर्वत पर रखा और अगला पग स्थान न होने से आकाश में डोलने लगा।
सर्वत्र हाहाकार मच गया। बलि के क्षमायाचना करने पर उन्होंने मुनिराज अपने स्वरूप में आए। इस तरह सात सौ मुनियों की रक्षा हुई। विघ्न दूर होते ही प्रजा ने खुशियां मनाई, श्री मुनि संघ को स्वास्थ्य के अनुकूल आहार दिया, वैयावृत्ति की, तभी से जैन परंपरा में रक्षाबंधन मनाया जाता है। रक्षाबंधन के दिन जैन मंदिरों में श्रावक-श्राविकाएं जाकर धर्म और संस्कृति की रक्षा के संकल्प पूर्वक रक्षासूत्र बांधते हैं और रक्षाबंधन पूजन करते हैं।
इस अवसर पर माताजी द्वारा अभिमंत्रित रक्षा सूत्र वितरित किये गए। समाज जनों के द्वारा माताजी की पिच्छी को राखियां व रक्षा सूत्र बांधे गये। इस अवसर पर सभी जिनमंदिरों के साथ पोदनपुरम नमोकार धाम सहित मोटक्का में भी लाडू समर्पित कर भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। इस शुभ अवसर पर सभी समाजजन उपस्थित थे।













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