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सिद्धचक्र महामंडल विधान के समापन पर उमड़े समाजजन: मंदिर में स्वर्ण कलशों से श्री जी का जलाभिषेक किया


सिद्धचक्र महामंडल विधान के समापन की बेला में विश्व शांति एवं कल्याण की पावन भावना के साथ महायज्ञ कर विशाल रथयात्रा निकाली गई। आठ दिनों तक सिद्धों की आराधना पूजा भक्ति के पश्चात अंतिम दिन महायज्ञ एवं रथयात्रा के पावन अवसर पर जैन मंदिर में उल्लासपूर्ण, भक्तिमय जैसा वातावरण था। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। सिद्धचक्र महामंडल विधान के समापन की बेला में विश्व शांति एवं कल्याण की पावन भावना के साथ महायज्ञ कर विशाल रथयात्रा निकाली गई। श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के विधानाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने बताया कि निरंतर आठ दिनों तक सिद्धों की आराधना पूजा भक्ति के पश्चात अंतिम दिन महायज्ञ एवं रथयात्रा के पावन अवसर पर जैन मंदिर में उल्लासपूर्ण, भक्तिमय जैसा वातावरण था। विधान में सिद्धों की आराधना करने वाले समस्त इंद्र इंद्राणी, श्रावक श्राविकाएं अपने विशेष परिधान में हार मुकुट से सुसज्जित महायज्ञ के कुण्डों के इर्द गिर्द बैठकर मंत्रों के साथ विश्व शांति एवं कल्याण की भावना के सहित कुंडों में आहुति दे रहे थे। महायज्ञ में सुगंधित धूप, घी एवं जड़ी बूटियों की आहुति से उत्पन्न सुगंधित धुएं से मंडप में विराजमान श्रद्धालु आनंदित महसूस कर रहे थे।

विशाल एवं भव्य रथयात्रा ने किया नगर भ्रमण

महायज्ञ के बाद मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में भव्य शोभायात्रा निकाली गई। सर्वप्रथम श्री जिनेंद्र प्रभु की प्रतिमा को रथ पर विराजमान किया गया। बैंडबाजों और घोड़ा बग्घी के साथ बड़े जैन मंदिर से रथयात्रा प्रारंभ होकर शंकर बाजार, महादेव नाका, स्टेशन रोड, हनुमान चौराहा, सराफा बाजार, लोहिया बाजार भ्रमण करती हुई बड़े जैन मंदिर पहुंची। शोभायात्रा में युगल मुनिराज श्री जिनेंद्र प्रभु के रथ के आगे आगे चल रहे थे। तीन लोक के नाथ के रथ को युवा साथी अपने हाथों से खींच रहे थे। शोभायात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर श्री जी की आरती एवं पूज्य युगल मुनिराजों का पाद प्रक्षालन कर भव्य अगवानी की गई। भव्य शोभायात्रा में आगे-आगे चल रहीं घोड़ा बग्गियों में सिद्धचक्र विधान के विशेष इंद्र-इंद्राणी विराजमान थे। बड़े जैन मंदिर में प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी के निर्देशन में स्वर्ण कलशों द्वारा श्री जी का जलाभिषेक किया गया। कलशों से निकली जलधारा जैसे ही जिनेंद्र प्रभु के सिर पर आई, वैसे ही पूरा पंडाल करतल ध्वनि के साथ भगवान की जय जयकार करने लगा। सभी उपस्थित साधर्मी बंधुओं माताओं बहिनों ने श्री जिनेंद्र प्रभु की आरती कर पुण्यार्जन किया।

पुण्यार्जक परिवार ने प्रभु एवं युगल मुनिराजों से की क्षमा याचना

महायज्ञ से पूर्व प्रातःकालीन बेला में श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया गया। महायज्ञ एवं रथयात्रा के साथ ही आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का समापन हुआ विधान समापन पर सभी विधानकर्ताओं ने श्री जिनेंद्र प्रभु एवं युगल मुनिराजों के श्री चरणों में विधान के दौरान जाने अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा याचना की। समारोह के समापन पर विधान पुण्यार्जक परिवार कैलाशचंद राकेश जैन शानू जैन पूणारावत परिवार दिल्ली की ओर से प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी, बाहर से आए हुए अतिथियों, पुजारीगण एवं भजन गायक व संगीतकार नीलेश जैन सागर का बहुमान किया गया।

मुनिश्री विलोकसागरजी ने कहा-पाप कर्म किसी पर दया नहीं करता

श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के समापन पर मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि पाप कर्म किसी पर दया नहीं करता, वह अपना काम करके ही रहता है। कोई भी हो चाहे वह राजा हो, मंत्री हो, करोड़पति हो, भिखारी हो, पापकर्म बांधते समय आनंदित होता है, लेकिन, जब उसका परिणाम भुगतता है तो उसकी सारी हेकड़ी निकल जाती है। शुरू-शुरू में जब कोई व्यक्ति पाप करता है तो वह अपने आप को असहज महसूस करता है, पुनः पाप करते समय वह अपने आप को सहज महसूस करता है, फिर पाप करने में वह पाप की उपेक्षा करता है, पाप को नजर अंदाज करता है और पुनः पुनः बार पाप करने पर वह आनंद मनाता है अर्थात वह निर्लज्ज बन जाता है। इसके बाद में जब भी वह पाप करता है तब वह अपने आप को बहादुर समझने लगता है। जैसे जैसे पाप के संस्कार गहरे होते जाते है, तब उसे पाप करने में आनंद आता है और पाप करने में कोई दोष नजर नहीं आता है। यदि कोई उसे समझता है तो वह समझने वाले को ही मूर्ख समझता है। वह समझते हैं कि इसमें बुराई क्या है, यह तो मेरे पुण्य का फल है परन्तु, जब पुण्य क्षीण होता है और पाप का उदय होता है तब उनकी सारी अकड़ निकल जाती है क्योंकि, पाप किसी पर भी दया नहीं करता हैं।इसलिए पाप कर्म त्यागने योग्य है।

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